Sunday, August 22, 2021

रक्षाबंधन की कथा

एक सौ यज्ञ पूर्ण कर लेने पर दानवेन्द्र राजा बलि के मन में स्वर्ग का प्राप्ति की इच्छा बलवती हो गई तो इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा। इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की। भगवान ने वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर लिया और राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुँच गए। उन्होंने बलि से तीन पग भूमि भिक्षा में मांग ली। बलि के गु्रु शुक्रदेव ने ब्राह्मण रुप धारण किए हुए विष्णु को पहचान लिया और बलि को इस बारे में सावधान कर दिया किंतु दानवेन्द्र राजा बलि अपने वचन से न फिरे और तीन पग भूमि दान कर दी। वामन रूप में भगवान ने एक पग में स्वर्ग और दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लिया। तीसरा पैर कहाँ रखें? बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। यदि वह अपना वचन नहीं निभाता तो अधर्म होता। आखिरकार उसने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया और कहा तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए। वामन भगवान ने वैसा ही किया। पैर रखते ही वह रसातल लोक में पहुँच गया। जब बलि रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया और भगवान विष्णु को उनका द्वारपाल बनना पड़ा। भगवान के रसातल निवास से परेशान लक्ष्मी जी ने सोचा कि यदि स्वामी रसातल में द्वारपाल बन कर निवास करेंगे तो बैकुंठ लोक का क्या होगा। इस समस्या के समाधान के लिए लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय सुझाया। लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबंंधन बांधकर अपना भाई बनाया और उपहार स्वरुप अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ ले आयीं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी यथा रक्षा-बंधन मनाया जाने लगा। भविष्य पुराण के अनुसार- रक्षा विधान के समय निम्न लिखित मंत्रोच्चार किया गया था जिसका आज भी विधिवत पालन किया जाता है: "येन बद्धोबली राजा दानवेन्द्रो महाबल: ।दानवेन्द्रो मा चल मा चल ।।" इस मंत्र का भावार्थ है कि दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूँ। हे रक्षे! (रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। यह रक्षा विधान श्रवण मास की पूर्णिमा को प्रातः काल संपन्न किया गया यथा रक्षा-बंधन अस्तित्व में आया और श्रवण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने लगा।

Saturday, July 31, 2021

जगन्नाथ मंदिर के रक्षक हैं बेड़ी हनुमान जी

जगन्नाथ मंदिर के रक्षक हैं बेड़ी हनुमान जी ओड़िसा में सप्तपुरियों में से एक है पुरी जहां प्रभु जगन्नाथ का विश्‍व प्रसिद्ध मंदिर है। इसे चार धामों में एक माना जाता है। इस मंदिर को राजा इंद्रद्युम्न ने हनुमानजी की प्रेरणा से बनवाया था। कहते हैं कि इस मंदिर की रक्षा का दायित्व प्रभु जगन्नाथ ने श्री हनुमानजी को ही सौंप रखा है। यहां के कण कण में हनुमानजी का निवास है। हनुमानजी ने यहां कई तरह के चमत्कार बताए हैं। इस मंदिर के चारों द्वार के सामने रामदूत हनुमानजी की चौकी है अर्थात मंदिर है। परंतु मुख्‍य द्वार के सामने जो समुद्र है वहां पर बेड़ी हनुमानजी का वास है। यह कथा बहुत लंबी है कि क्यों हनुमानजी बेड़ी हनुमानी के रूप में यहां स्थापित हुए। माना जाता है कि तीन बार समुद्र ने जगन्नाथजी के मंदिर को तोड़ दिया था। तब महाप्रभु जगन्नाथ ने वीर मारुति (हनुमानजी) को यहां समुद्र को नियंत्रित करने हेतु नियुक्त किया था, परंतु जब-तब हनुमान भी जगन्नाथ-बलभद्र एवं सुभद्रा के दर्शनों का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे। वे प्रभु के दर्शन के लिए नगर में प्रवेश कर जाते थे, ऐसे में समुद्र भी उनके पीछे नगर में प्रवेश कर जाता था। केसरीनंदन हनुमानजी की इस आदत से परेशान होकर जगन्नाथ महाप्रभु ने हनुमानजी को यहां स्वर्ण बेड़ी से आबद्ध कर दिया। यहां जगन्नाथपुरी में ही सागर तट पर बेदी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। भक्त लोग बेड़ी में जकड़े हनुमानजी के दर्शन करने के लिए आते हैं।

Friday, July 23, 2021

काशी में भगवान गणेश के त्रिनेत्र स्वरूप की होती है पूजा, जानिए क्यों खास है ये मंदिर हिन्दू धर्म में बुधवार के दिन पूरे विधि विधान के साथ भगवान गणेश की पूजा की जाती है। भगवान गणेश भक्तों पर प्रसन्न होकर उनके दुखों को हरते हैं और सभी की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार कोई भी शुभ कार्य करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जानी जरूरी है। भगवान गणेश सभी के दुखों को हरते हैं। काशी में जिसे खासतौर पर भगवान शिव की नगरी कहा जाता है, उनके पुत्र भगवान गणेश के लिए भी प्रचलित है। काशी में ही शिव जी के पुत्र भगवान गणेश अपने विशेष रूप में स्थापित हैं। काशी में स्थापित स्वंयभू भगवान गणेश जी की यह मूर्ति त्रिनेत्र स्वरूप की है। मान्यता है कि इस मंदिर में जाकर विघ्नहर्ता गणेश जी के त्रिनेत्र रूप की आराधना करने से भक्तों के जीवन की सभी बाधांए दूर हो जाती हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भगवान गणेश का स्वंभू त्रिनेत्र प्रतिमा वाला यह मंदिर बनारस के लोहटिया नामक इलाके में स्थित है। इन्हें बड़ा गणेश भी कहा जाता है। मान्यता है कि जब काशी में गंगा मां के साथ मंदाकिनी नदी भी बहती थी उस समय भगवान गणेश की यह प्रतिमा यहां मिली थी। माना जाता है कि उस दिन माघ मास की संकष्टी चतुर्थी का दिन था, तब से इस दिन यहां मेले का आयोजन होता है। गणेश जी का यह मंदिर 40 खम्भों की विशेष शैली में बना है, जो यहां आने वाले सभी भक्तों को एक अद्भुत नजारा प्रदर्शित करता है। दूर-दूर से भक्त यहां दर्शन के लिए आते हैं। यहां पर भगवान गणेश अपनी दोनों पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि और संतानों शुभ-लाभ के साथ विराजमान हैं। मान्यता है कि गणेश जी के इस रूप की आराधना करने से व्यक्ति को अपने जीवन में ऋद्धि-सिद्धि तथा शुभ-लाभ की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में गणेश जी की बंद कपाट पूजा का विशेष महत्व है। जिसे देखने की अनुमति किसी को भी नहीं है। यहां मन्नत मांगने के लिए पहुंचने वालों और अपने कष्ट को दूर करने की मुराद लेकर आने वाले भक्तों की हमेशा भीड़ लगी रहती है। मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन भगवान के दर्शन का विशेष लाभ मिलता है।

Friday, July 2, 2021

मकान की नींव में सर्प और कलश क्यों गाड़ा जाता है

श्रीमद् भागवत महापुराण के पांचवें स्कंद में लिखा है कि पृथ्वी के नीचे पाताल लोक है और इसके स्वामी शेषनाग हैं। भूमि से दस हजार योजन नीचे अतल, अतल से दस हजार योजन नीचे वितल, उससे दस हजार योजन नीचे सतल, इसी क्रम से सब लोक स्थित हैं। अतल, वितल, सतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल ये सातों लोक पाताल स्वर्ग कहलाते हैं। इनमें भी काम, भोग, ऐश्वर्य, आनन्द, विभूति ये वर्तमान हैं। दैत्य, दानव, नाग ये सब वहां आनन्द पूर्वक भोग-विलास करते हुए रहते हैं। इन सब पातालों में अनेक पुरियां प्रकाशमान रहती हैं। इनमें देवलोक की शोभा से भी अधिक बाटिका और उपवन हैं। इन पातालों में सूर्य आदि ग्रहों के न होने से दिन-रात्रि का विभाग नहीं है। इस कारण काल का भय नहीं रहता है। यहां बड़े-बड़े नागों के सिर की मणियां अंधकार दूर करती रहती हैं। पाताल में ही नाग लोक के पति वासुकी आदि नाग रहते हैं। श्री शुकदेव के मतानुसार पाताल से तीस हजार योजन दूर शेषजी विराजमान हैं। शेषजी के सिर पर पृथ्वी रखी है। जब ये शेष प्रलय काल में जगत के संहार की इच्छा करते हैं, तो क्रोध से कुटिल भृकुटियों के मध्य तीन नेत्रों से युक्त 11 रुद्र त्रिशूल लिए प्रकट होते हैं। पौराणिक ग्रंथों में शेषनाग के फण (मस्तिष्क) पर पृथ्वी टिकी होने का उल्लेख मिलता है । उल्लेखनीय है कि हजार फणों वाले शेषनाग समस्त नागों के राजा हैं। भगवान् की शव्या बनकर सुख पहुंचाने वाले, उनके अनन्य भक्त हैं और बहुत बार भगवान् के साथ-साथ अवतार लेकर उनकी लीला में सम्मिलित भी रहते हैं। नींव पूजन का पूरा कर्मकांड इस मनोवैज्ञानिक विश्वास पर आधारित है कि जैसे शेषनाग अपने फण पर संपूर्ण पृथ्वी को धारण किए हुए है, ठीक उसी प्रकार मेरे इस भवन की नींव भी प्रतिष्ठित किए हुए चांदी के नाग के फण पर पूर्ण मजबूती के साथ स्थापित रहे । शेषनाग क्षीरसागर में रहते हैं, इसलिए पूजन के कलश में दूध, दही, घी डालकर मंत्रों से आह्वान कर शेषनाग को बुलाया जाता है, ताकि वे साक्षात् उपस्थित होकर भवन की रक्षा का भार वहन करें। विष्णुरूपी कलश में लक्ष्मी स्वरूप सिक्का डालकर पुष्प व दूध पूजन में अर्पित किया जाता है, जो नागों को अतिप्रिय है। भगवान् शिवजी के आभूषण तो नाग है ही। लक्ष्मण और बलराम शेषावतार माने जाते हैं। इसी विश्वास से यह प्रथा जारी है।

Tuesday, March 23, 2021

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी, की व्यवहारिक कुटनीति

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी, की व्यवहारिक कुटनीति भगवान श्रीरामचन्द्र जी प्रतिदिन राज्यसभा में जनमानस कि पीड़ा सुनते थे। एक दिन च्यवन ऋषि अपने शिष्यों के साथ , राज्यसभा में प्रस्तुत हुये। उन्होंने बताया कि मथुरा का शासक लवणासुर बहुत अत्याचारी है। उसके तांडव से नागरिक मथुरा से भाग रहे है। भगवान राम ने, सुमंत जी से सारी जानकारी के साथ अगले दिन राज्यसभा में प्रस्तुत होने की आज्ञा दी। दूसरे दिन राज्यसभा में जो साक्ष्य दिये गए , उससे यह सिद्ध हुआ कि ऋषियों की बात सही है। शत्रुघ्न ने यह कार्य करने का अनुरोध किया। लेकिन भगवान श्रीरामचन्द्र जी मौन थे।हनुमानजी जी ने पूछा, प्रभु आपकी चिंता का कारण क्या है ? लवणासुर को शिव का त्रिशूल मिला है इसलिये आप चिंतित है ? शत्रुघ्न उसे पराजित नहीं कर सकेंगे। कौशलाधीश ने कहा नहीं हनुमंत ऐसी बात नहीं है। मेरी चिंता का कारण कुछ और है। जो सुमंत जी ने परिपत्र मुझे दिया है , उसके अनुसार लवणासुर के पास कोई संतान नहीं है। उसने अपने सगे सम्बन्धियों को भी मार डाला है।नीति कहती है, राज्य और नागरिक दोषी नहीं होते।शासक गलत होते है। यदि हम शासक को हटा रहे है तो उसका विकल्प अवश्य होना चाहिये। नहीं तो राज्य में अराजकता फैल जाएगी। लंका ,किष्किंधा आदि राज्यों में मैंने अत्याचारी शासकों के योग्य उत्तराधिकारी को राज्य दे दिया। मथुरा में क्या विकल्प है ? यदि कोई उत्तराधिकारी नहीं है तो शत्रुघ्न यह उत्तरदायित्व ले तो उन्हें अनुमति है।शत्रुघ्न इससे सहमति व्यक्त किये की वह मथुरा राज्य का कार्यभार देखेंगे। शत्रुघ्न को भगवान ने एक बाण दिया जो अचूक था। उन्होंने कहा अपरिहार्य हो , तभी चलाना , इसका प्रयोग मैने #रावण के विरुद्ध भी नहीं किया था।आप समझ सकते है, मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी कितने महान राजा थे, कितनी व्यवहारिक कुटनीति थी।

Thursday, November 21, 2019

मैं चंपा नदी हूं ...या नाला

मैं चंपा नदी हूं। मेरा इतिहास भारतीय संस्कृति के प्रसार की गहराईयों में है। उत्तर वैदिक काल के 16 महाजनपदों में एक अंग था। इसकी राजधानी चम्पा वर्तमान में भागलपुर का चंपानगर ही थी। वर्तमान के बिहार के मुंगेर, बांका और भागलपुर जिले इसमें आते हैं। अंग क्षेत्र और मेरे बारे में वाल्मिीकि रामायण के बालकांड के नवम सर्ग के कई श्लोकों में वर्णण मिलता है। इसके अनुसार काश्यापस्य च पुत्रो:स्ति विभाण्डक इति श्रुत:ऋष्य श्रृंगति ख्यात: तस्य पुत्रो भविष्यति। अर्थात-महर्षि कश्यप के विभाण्डक नाम का एक पुत्र है और विभाण्डक का ही पुत्र श्रृंगी है। एतस्मिन एव काले तु रोमपाद प्रतापवान। आडग़ेषु पथितो राजा भविद्वयति महाबन।। तस्य व्यक्तिक्रमात राजो भविष्यति सुदारूणा। अनावृष्टि सुघोरा वै सर्वलोक भयावहा।। अर्थात- उस समय अंग देश मे रोमपाद नामक बड़ा ही शक्तिशाली और प्रतापी राजा थे। किसी कारण उनके द्वारा धर्म का उल्लंघन हो जाने के कारण सब लोग भयभीत हो गए। लंबे समय तक क्षेत्र में वर्षा नहीं हुई। इससे राजा रोमपाद को बहुत दुख हुआ। इससे व्यथित हो उन्होंने ब्राह्मण मंत्रियों से मंत्रणा की। इसके बाद ब्राह्मणों का आदेश हुआ कि किसी तरह ऋ षी श्रृंगी को यहां लाया जाए तभी समस्या का सामाधान हो सकता है। श्रृंगी ऋषि का आश्रम कोसी तट पर सनोखर के पास था। उस समय मधेपुरा का यह पूरा क्षेत्र अंगराज का अरण्य भाग कहलाता था। उन्हेंं यहां आने के लिए रिझाने को देवदासियों का सहारा लिया गया। इस प्रक्रिया में राजा सफल हुए और ऋषी श्रृंगी यहां पधारे। उनका अंग की धरती पर बहुत शानदार स्वागत किया गया। अंग की राजधानी मालिनी में प्रवास के दौरान ही श्रृंगी ऋषि के गहन पर्यवेक्षण में एक नहर का निर्माण हुआ जिससे दक्षिण की नदियों की उफनती धारा को गंगा में मिलाने का मार्ग दिया गया। इसी के जल से इस क्षेत्र को नया जीवन मिला। रोमपाद के पौत्र चंप के नाम पर मालिनी का नाम चम्पा हो गया और उसके बगल से श्रृंगी द्वारा निकाली गई नहर का नाम बाद में चंपानदी हो गया। धार्मिक ग्रंथों में चंपा -विष्णु पुराण के अनुसार पृथुलाक्ष के पुत्र चंप ने इस नगरी को बसाया था-ततश्चंपो यशच्म्पां निवेश्यामास। -हरिवंश पुराण और मत्स्य पुराण में कहा गया है- चंपस्य तु पुरी चंपा या मालिन्यभवत् पुरा। चंपा को चंपपुरी भी कहा गया है। इससे यह भी सूचित होता है कि चंपा का पहला नाम मालिनी था और चंप नामक राजा ने उसे चंपा नाम दिया था। -महाभारत के अनुसार-च्प्रीत्या ददौ स कर्णाय मालिनीं नगरीनथ। अंगेषु नरशार्दूल स राजाऽऽसीत् सपत्नजित्॥ पालयामास चम्पां च कर्ण: परबलार्दन:। दुर्योधनस्यानुमते तवापि विदितं तथाच्॥ अर्थात-जरासंध ने कर्ण को चंपा या मालिनी का राजा मान लिया था। इसी में वर्णित एक आख्यान के अनुसार चंंपा गंगा के तट पर बसी थी--चर्मण्वत्याश्च यमुनां ततो गंगा जगाम ह, गंगाया सूत विषयं चंपामनुययौ पुरीम्। -प्राचीन कथाओं से सूचित होता है कि इस नगरी के चतुर्दिक् चंपक वृक्षों की मालाकार पंक्तियां थीं। इस कारण इसे चंपमालिनी या केवल मालिनी कहते थे। -मेरे बारे में जातक-कथाओं और चीनी यात्री ह्वेनत्सांग के यात्रावृतांत में भी उल्लेख है। इस क्षेत्र की समृद्धि तथा यहां के संपन्न व्यापारियों का अनेक स्थानों पर उल्लेख है। चंपा में कौशेय या रेशम का सुन्दर कपड़ा बुना जाता था जिसका दूर-दूर तक भारत से बाहर दक्षिणपूर्व एशिया के अनेक देशों तक व्यापार होता था। (रेशमी कपड़े की बुनाई की यह परम्परा वर्तमान भागलपुर में अभी तक चल रही है)।

Friday, May 12, 2017

वेद सार- 105



यत संयमो न वि यमो वि यमो यन्‍न संयम।

इन्‍द्रजा: सोमजा आथर्वणमसि व्‍याघ्रजम्‍भनम।।

                                          अथर्ववेद –4/3/7

व्‍याख्‍या--  हिंसक प्रवृत्तियों वाले व्‍याघ्रादि को अधीन करने के लिए अथर्वा दवारा प्रयुक्‍त और इन्‍द्र तथा सोम दवारा प्रकट नियम यह है कि जहां संयम सफल ना हो वहा दमन का प्रयोग किया जाय और जहां दमन की आवश्‍यकता ना हो वहां संयम से कार्य करना ही उपयुक्‍त है।
  
उदुषा उदु सूर्य उदिदं मामकं वच।

उदेजतु प्रजापतिर्वृषा शुष्‍मेण वाजिना।।   

                                           अथर्ववेद—4/4/2
व्‍याख्‍या—बलशाली वीर्य से संपन्‍न करने वाले हे सूर्य हमारा यह मंत्र युक्‍त वचन भी इस वीर्य की वृदिध करने वाला हो । उषा भी वीर्य से उद़ध्‍ृत्र करे । प्रजापति भी बल –वीर्य से संपन्‍न करे।