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Thursday, November 21, 2019

मैं चंपा नदी हूं ...या नाला

मैं चंपा नदी हूं। मेरा इतिहास भारतीय संस्कृति के प्रसार की गहराईयों में है। उत्तर वैदिक काल के 16 महाजनपदों में एक अंग था। इसकी राजधानी चम्पा वर्तमान में भागलपुर का चंपानगर ही थी। वर्तमान के बिहार के मुंगेर, बांका और भागलपुर जिले इसमें आते हैं। अंग क्षेत्र और मेरे बारे में वाल्मिीकि रामायण के बालकांड के नवम सर्ग के कई श्लोकों में वर्णण मिलता है। इसके अनुसार काश्यापस्य च पुत्रो:स्ति विभाण्डक इति श्रुत:ऋष्य श्रृंगति ख्यात: तस्य पुत्रो भविष्यति। अर्थात-महर्षि कश्यप के विभाण्डक नाम का एक पुत्र है और विभाण्डक का ही पुत्र श्रृंगी है। एतस्मिन एव काले तु रोमपाद प्रतापवान। आडग़ेषु पथितो राजा भविद्वयति महाबन।। तस्य व्यक्तिक्रमात राजो भविष्यति सुदारूणा। अनावृष्टि सुघोरा वै सर्वलोक भयावहा।। अर्थात- उस समय अंग देश मे रोमपाद नामक बड़ा ही शक्तिशाली और प्रतापी राजा थे। किसी कारण उनके द्वारा धर्म का उल्लंघन हो जाने के कारण सब लोग भयभीत हो गए। लंबे समय तक क्षेत्र में वर्षा नहीं हुई। इससे राजा रोमपाद को बहुत दुख हुआ। इससे व्यथित हो उन्होंने ब्राह्मण मंत्रियों से मंत्रणा की। इसके बाद ब्राह्मणों का आदेश हुआ कि किसी तरह ऋ षी श्रृंगी को यहां लाया जाए तभी समस्या का सामाधान हो सकता है। श्रृंगी ऋषि का आश्रम कोसी तट पर सनोखर के पास था। उस समय मधेपुरा का यह पूरा क्षेत्र अंगराज का अरण्य भाग कहलाता था। उन्हेंं यहां आने के लिए रिझाने को देवदासियों का सहारा लिया गया। इस प्रक्रिया में राजा सफल हुए और ऋषी श्रृंगी यहां पधारे। उनका अंग की धरती पर बहुत शानदार स्वागत किया गया। अंग की राजधानी मालिनी में प्रवास के दौरान ही श्रृंगी ऋषि के गहन पर्यवेक्षण में एक नहर का निर्माण हुआ जिससे दक्षिण की नदियों की उफनती धारा को गंगा में मिलाने का मार्ग दिया गया। इसी के जल से इस क्षेत्र को नया जीवन मिला। रोमपाद के पौत्र चंप के नाम पर मालिनी का नाम चम्पा हो गया और उसके बगल से श्रृंगी द्वारा निकाली गई नहर का नाम बाद में चंपानदी हो गया। धार्मिक ग्रंथों में चंपा -विष्णु पुराण के अनुसार पृथुलाक्ष के पुत्र चंप ने इस नगरी को बसाया था-ततश्चंपो यशच्म्पां निवेश्यामास। -हरिवंश पुराण और मत्स्य पुराण में कहा गया है- चंपस्य तु पुरी चंपा या मालिन्यभवत् पुरा। चंपा को चंपपुरी भी कहा गया है। इससे यह भी सूचित होता है कि चंपा का पहला नाम मालिनी था और चंप नामक राजा ने उसे चंपा नाम दिया था। -महाभारत के अनुसार-च्प्रीत्या ददौ स कर्णाय मालिनीं नगरीनथ। अंगेषु नरशार्दूल स राजाऽऽसीत् सपत्नजित्॥ पालयामास चम्पां च कर्ण: परबलार्दन:। दुर्योधनस्यानुमते तवापि विदितं तथाच्॥ अर्थात-जरासंध ने कर्ण को चंपा या मालिनी का राजा मान लिया था। इसी में वर्णित एक आख्यान के अनुसार चंंपा गंगा के तट पर बसी थी--चर्मण्वत्याश्च यमुनां ततो गंगा जगाम ह, गंगाया सूत विषयं चंपामनुययौ पुरीम्। -प्राचीन कथाओं से सूचित होता है कि इस नगरी के चतुर्दिक् चंपक वृक्षों की मालाकार पंक्तियां थीं। इस कारण इसे चंपमालिनी या केवल मालिनी कहते थे। -मेरे बारे में जातक-कथाओं और चीनी यात्री ह्वेनत्सांग के यात्रावृतांत में भी उल्लेख है। इस क्षेत्र की समृद्धि तथा यहां के संपन्न व्यापारियों का अनेक स्थानों पर उल्लेख है। चंपा में कौशेय या रेशम का सुन्दर कपड़ा बुना जाता था जिसका दूर-दूर तक भारत से बाहर दक्षिणपूर्व एशिया के अनेक देशों तक व्यापार होता था। (रेशमी कपड़े की बुनाई की यह परम्परा वर्तमान भागलपुर में अभी तक चल रही है)।

Sunday, January 15, 2017

मध्‍यकालीन इतिहास का कर्टेन लेजर

मैं अपने व्‍लाग के प्रति वैश्विक स्‍तर पर पाठकों के जुडाव और उनकी अभिरुचि को देखते हुए मध्‍यकालीन भारतीय इतिहास से जुडी कुछ तथ्‍यों को किस्‍तों में पेश करूंगा जो न केवल आपके ज्ञान को समृदध करेगा बल्कि पेशेवर लोगों व वैसे छात्रों के लिए भी काफी मददगार साबित होगा जो किसी उच्‍चस्‍तरीय प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं या करने की सोच रहे हैं।  हलांकि संभव है कि बहुत कुछ आपलोग जानते भी हों वाबजूद मुझे उम्‍मीद है कि इस शीर्षक के अन्‍तर्गत छपने वाली सामग्री आपके लिए उपयोगी होगी। संबंधित सामग्री पर आपलोगों की क्‍या राय है या आपको इसका मीटिरियल कैसा लगा हमें कमेंट अवश्‍य भेजें।

डा. राजीव रंजन ठाकुर