Friday, July 2, 2021
मकान की नींव में सर्प और कलश क्यों गाड़ा जाता है
श्रीमद् भागवत महापुराण के पांचवें स्कंद में लिखा है कि पृथ्वी के नीचे पाताल लोक है और इसके स्वामी शेषनाग हैं। भूमि से दस हजार योजन नीचे अतल, अतल से दस हजार योजन नीचे वितल, उससे दस हजार योजन नीचे सतल, इसी क्रम से सब लोक स्थित हैं। अतल, वितल, सतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल ये सातों लोक पाताल स्वर्ग कहलाते हैं। इनमें भी काम, भोग, ऐश्वर्य, आनन्द, विभूति ये वर्तमान हैं। दैत्य, दानव, नाग ये सब वहां आनन्द पूर्वक भोग-विलास करते हुए रहते हैं। इन सब पातालों में अनेक पुरियां प्रकाशमान रहती हैं। इनमें देवलोक की शोभा से भी अधिक बाटिका और उपवन हैं। इन पातालों में सूर्य आदि ग्रहों के न होने से दिन-रात्रि का विभाग नहीं है। इस कारण काल का भय नहीं रहता है। यहां बड़े-बड़े नागों के सिर की मणियां अंधकार दूर करती रहती हैं। पाताल में ही नाग लोक के पति वासुकी आदि नाग रहते हैं। श्री शुकदेव के मतानुसार पाताल से तीस हजार योजन दूर शेषजी विराजमान हैं। शेषजी के सिर पर पृथ्वी रखी है। जब ये शेष प्रलय काल में जगत के संहार की इच्छा करते हैं, तो क्रोध से कुटिल भृकुटियों के मध्य तीन नेत्रों से युक्त 11 रुद्र त्रिशूल लिए प्रकट होते हैं। पौराणिक ग्रंथों में शेषनाग के फण (मस्तिष्क) पर पृथ्वी टिकी होने का उल्लेख मिलता है । उल्लेखनीय है कि हजार फणों वाले शेषनाग समस्त नागों के राजा हैं। भगवान् की शव्या बनकर सुख पहुंचाने वाले, उनके अनन्य भक्त हैं और बहुत बार भगवान् के साथ-साथ अवतार लेकर उनकी लीला में सम्मिलित भी रहते हैं। नींव पूजन का पूरा कर्मकांड इस मनोवैज्ञानिक विश्वास पर आधारित है कि जैसे शेषनाग अपने फण पर संपूर्ण पृथ्वी को धारण किए हुए है, ठीक उसी प्रकार मेरे इस भवन की नींव भी प्रतिष्ठित किए हुए चांदी के नाग के फण पर पूर्ण मजबूती के साथ स्थापित रहे । शेषनाग क्षीरसागर में रहते हैं, इसलिए पूजन के कलश में दूध, दही, घी डालकर मंत्रों से आह्वान कर शेषनाग को बुलाया जाता है, ताकि वे साक्षात् उपस्थित होकर भवन की रक्षा का भार वहन करें। विष्णुरूपी कलश में लक्ष्मी स्वरूप सिक्का डालकर पुष्प व दूध पूजन में अर्पित किया जाता है, जो नागों को अतिप्रिय है। भगवान् शिवजी के आभूषण तो नाग है ही। लक्ष्मण और बलराम शेषावतार माने जाते हैं। इसी विश्वास से यह प्रथा जारी है।
Tuesday, March 23, 2021
मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी, की व्यवहारिक कुटनीति
मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी, की व्यवहारिक कुटनीति
भगवान श्रीरामचन्द्र जी प्रतिदिन राज्यसभा में जनमानस कि पीड़ा सुनते थे। एक दिन च्यवन ऋषि अपने शिष्यों के साथ , राज्यसभा में प्रस्तुत हुये। उन्होंने बताया कि मथुरा का शासक लवणासुर बहुत अत्याचारी है। उसके तांडव से नागरिक मथुरा से भाग रहे है। भगवान राम ने, सुमंत जी से सारी जानकारी के साथ अगले दिन राज्यसभा में प्रस्तुत होने की आज्ञा दी। दूसरे दिन राज्यसभा में जो साक्ष्य दिये गए , उससे यह सिद्ध हुआ कि ऋषियों की बात सही है। शत्रुघ्न ने यह कार्य करने का अनुरोध किया। लेकिन भगवान श्रीरामचन्द्र जी मौन थे।हनुमानजी जी ने पूछा, प्रभु आपकी चिंता का कारण क्या है ? लवणासुर को शिव का त्रिशूल मिला है इसलिये आप चिंतित है ? शत्रुघ्न उसे पराजित नहीं कर सकेंगे। कौशलाधीश ने कहा नहीं हनुमंत ऐसी बात नहीं है। मेरी चिंता का कारण कुछ और है। जो सुमंत जी ने परिपत्र मुझे दिया है , उसके अनुसार लवणासुर के पास कोई संतान नहीं है। उसने अपने सगे सम्बन्धियों को भी मार डाला है।नीति कहती है, राज्य और नागरिक दोषी नहीं होते।शासक गलत होते है। यदि हम शासक को हटा रहे है तो उसका विकल्प अवश्य होना चाहिये। नहीं तो राज्य में अराजकता फैल जाएगी। लंका ,किष्किंधा आदि राज्यों में मैंने अत्याचारी शासकों के योग्य उत्तराधिकारी को राज्य दे दिया। मथुरा में क्या विकल्प है ? यदि कोई उत्तराधिकारी नहीं है तो शत्रुघ्न यह उत्तरदायित्व ले तो उन्हें अनुमति है।शत्रुघ्न इससे सहमति व्यक्त किये की वह मथुरा राज्य का कार्यभार देखेंगे। शत्रुघ्न को भगवान ने एक बाण दिया जो अचूक था। उन्होंने कहा अपरिहार्य हो , तभी चलाना , इसका प्रयोग मैने #रावण के विरुद्ध भी नहीं किया था।आप समझ सकते है, मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी कितने महान राजा थे, कितनी व्यवहारिक कुटनीति थी।
Thursday, November 21, 2019
मैं चंपा नदी हूं ...या नाला
मैं चंपा नदी हूं। मेरा इतिहास भारतीय संस्कृति के प्रसार की गहराईयों में है। उत्तर वैदिक काल के 16 महाजनपदों में एक अंग था। इसकी राजधानी चम्पा वर्तमान में भागलपुर का चंपानगर ही थी। वर्तमान के बिहार के मुंगेर, बांका और भागलपुर जिले इसमें आते हैं। अंग क्षेत्र और मेरे बारे में वाल्मिीकि रामायण के बालकांड के नवम सर्ग के कई श्लोकों में वर्णण मिलता है। इसके अनुसार काश्यापस्य च पुत्रो:स्ति विभाण्डक इति श्रुत:ऋष्य श्रृंगति ख्यात: तस्य पुत्रो भविष्यति।
अर्थात-महर्षि कश्यप के विभाण्डक नाम का एक पुत्र है और विभाण्डक का ही पुत्र श्रृंगी है। एतस्मिन एव काले तु रोमपाद प्रतापवान। आडग़ेषु पथितो राजा भविद्वयति महाबन।।
तस्य व्यक्तिक्रमात राजो भविष्यति सुदारूणा। अनावृष्टि सुघोरा वै सर्वलोक भयावहा।।
अर्थात- उस समय अंग देश मे रोमपाद नामक बड़ा ही शक्तिशाली और प्रतापी राजा थे। किसी कारण उनके द्वारा धर्म का उल्लंघन हो जाने के कारण सब लोग भयभीत हो गए। लंबे समय तक क्षेत्र में वर्षा नहीं हुई। इससे राजा रोमपाद को बहुत दुख हुआ। इससे व्यथित हो उन्होंने ब्राह्मण मंत्रियों से मंत्रणा की। इसके बाद ब्राह्मणों का आदेश हुआ कि किसी तरह ऋ षी श्रृंगी को यहां लाया जाए तभी समस्या का सामाधान हो सकता है। श्रृंगी ऋषि का आश्रम कोसी तट पर सनोखर के पास था। उस समय मधेपुरा का यह पूरा क्षेत्र अंगराज का अरण्य भाग कहलाता था। उन्हेंं यहां आने के लिए रिझाने को देवदासियों का सहारा लिया गया। इस प्रक्रिया में राजा सफल हुए और ऋषी श्रृंगी यहां पधारे। उनका अंग की धरती पर बहुत शानदार स्वागत किया गया। अंग की राजधानी मालिनी में प्रवास के दौरान ही श्रृंगी ऋषि के गहन पर्यवेक्षण में एक नहर का निर्माण हुआ जिससे दक्षिण की नदियों की उफनती धारा को गंगा में मिलाने का मार्ग दिया गया। इसी के जल से इस क्षेत्र को नया जीवन मिला। रोमपाद के पौत्र चंप के नाम पर मालिनी का नाम चम्पा हो गया और उसके बगल से श्रृंगी द्वारा निकाली गई नहर का नाम बाद में चंपानदी हो गया।
धार्मिक ग्रंथों में चंपा
-विष्णु पुराण के अनुसार पृथुलाक्ष के पुत्र चंप ने इस नगरी को बसाया था-ततश्चंपो यशच्म्पां निवेश्यामास।
-हरिवंश पुराण और मत्स्य पुराण में कहा गया है- चंपस्य तु पुरी चंपा या मालिन्यभवत् पुरा। चंपा को चंपपुरी भी कहा गया है। इससे यह भी सूचित होता है कि चंपा का पहला नाम मालिनी था और चंप नामक राजा ने उसे चंपा नाम दिया था।
-महाभारत के अनुसार-च्प्रीत्या ददौ स कर्णाय मालिनीं नगरीनथ। अंगेषु नरशार्दूल स राजाऽऽसीत् सपत्नजित्॥ पालयामास चम्पां च कर्ण: परबलार्दन:।
दुर्योधनस्यानुमते तवापि विदितं तथाच्॥ अर्थात-जरासंध ने कर्ण को चंपा या मालिनी का राजा मान लिया था।
इसी में वर्णित एक आख्यान के अनुसार चंंपा गंगा के तट पर बसी थी--चर्मण्वत्याश्च यमुनां ततो गंगा जगाम ह, गंगाया सूत विषयं चंपामनुययौ पुरीम्।
-प्राचीन कथाओं से सूचित होता है कि इस नगरी के चतुर्दिक् चंपक वृक्षों की मालाकार पंक्तियां थीं। इस कारण इसे चंपमालिनी या केवल मालिनी कहते थे।
-मेरे बारे में जातक-कथाओं और चीनी यात्री ह्वेनत्सांग के यात्रावृतांत में भी उल्लेख है। इस क्षेत्र की समृद्धि तथा यहां के संपन्न व्यापारियों का अनेक स्थानों पर उल्लेख है। चंपा में कौशेय या रेशम का सुन्दर कपड़ा बुना जाता था जिसका दूर-दूर तक भारत से बाहर दक्षिणपूर्व एशिया के अनेक देशों तक व्यापार होता था। (रेशमी कपड़े की बुनाई की यह परम्परा वर्तमान भागलपुर में अभी तक चल रही है)।
Friday, May 12, 2017
वेद सार- 105
यत संयमो न वि यमो वि यमो यन्न
संयम।
इन्द्रजा: सोमजा आथर्वणमसि व्याघ्रजम्भनम।।
अथर्ववेद –4/3/7
व्याख्या-- हिंसक प्रवृत्तियों वाले व्याघ्रादि को अधीन
करने के लिए अथर्वा दवारा प्रयुक्त और इन्द्र तथा सोम दवारा प्रकट नियम यह है कि
जहां संयम सफल ना हो वहा दमन का प्रयोग किया जाय और जहां दमन की आवश्यकता ना हो
वहां संयम से कार्य करना ही उपयुक्त है।
उदुषा उदु सूर्य उदिदं मामकं
वच।
उदेजतु प्रजापतिर्वृषा शुष्मेण
वाजिना।।
अथर्ववेद—4/4/2
व्याख्या—बलशाली वीर्य से
संपन्न करने वाले हे सूर्य हमारा यह मंत्र युक्त वचन भी इस वीर्य की वृदिध करने
वाला हो । उषा भी वीर्य से उद़ध्ृत्र करे । प्रजापति भी बल –वीर्य से संपन्न
करे।
Friday, April 14, 2017
वेद सार--104
उदुत्सं शतऽधारं सहस्त्रधारमक्षितम।
एवास्माकेदं धान्यं सहस्त्रधारमक्षितम।।
अथर्ववेद—3/24/4
व्याख्या-- हजारों धाराओं से प्रवाहित होने पर जल की उत्नत्ति का स्थान खाली
नहीं होता, इसी प्रकार हमारा धन अनेक रूपों में व्यय होने के पश्चात
भी सदा स्थित रहता है।
शतहस्त समाहार सहस्त्रहस्त सं किर।
कृतस्य कार्यस्य चेह स्फातिं समावह।।
अथर्ववेद—3/24/5
व्याख्या-- हे मनुष्यो अपने दवारा किए गए और किए जानेवाले कार्यों की वृदिध
के निमित्त सैकङों हाथों वाले होकर धन का संचय करो और हजारों हाथों वाले होकर
उसका दान करो।
Friday, March 31, 2017
वेद सार - 103
येन वेहद बभूविथ नाशयामसि तत त्वत।
इदं तदन्यत्र त्वदप दूरे नि दध्मसि।।
अथर्ववेद—3/23/1
व्याख्या– जिस पापजन्य व्याधि के कारण हे स्त्री तू बांझ हुई है उस व्याधि को हम तुझसे दूर करते हैं। यह व्याधि िफर से उत्पन्न न हो इसलिए इसे हम तुझसे दूर करते हैं।
आ ते योनिं गर्भ एतु पुमान बाण इवेषुधिम ।
आ वीरोऽत्र जायतां पुत्रस्ते दशमास्य:।।
अथर्ववेद—3/23/2
व्याख्या– तरकस में बाण के प्रवेश करने के समान ही हे स्त्री पुंसत्व से युक्त गर्भ को तेरे गर्भाशय में स्थापित करते हैं। इस गर्भ से दश माह के उपरांत वीर पुत्र की उत्पत्ति हो।
कृणोभि ते प्राजापत्यमा योनिं गर्भ एतु ते।
विन्दस्व त्वं पुत्रं नारि यस्तुभ्यं शमसच्छतुमु तस्मै त्वं भव।।
अथर्ववेद—3/23/5
व्याख्या– हे स्त्री प्रजापति द़वारा बनाए प्रजनन संबंधी नियमानुसार हम तेरे निमित्त यह विधान करते हैं । इस विधान के द़वारा गर्भाशय में गर्भ की स्थापना हो तथा तुझे सुख प्रदान करने वाले पुत्र की प्राप्ति हो।
वेद सार - 102
येन हस्ती वर्चसा सम्वभूव येन राजा मनुष्येष्वप्स्वन्त:।
येन देवा देवतामग्र आयन्तेन
मामद़य वर्चसाग्ने वर्चस्विनं कृणु ।।
अथर्ववेद—3/22/3
व्याख्या – जिस तेज से जलचर
प्राणी शक्तिसंपन्न होते हैं, राजा मनुष्यों में तेजस्वी होता है और जिस तेज के द़वारा
देवों ने सर्वप्रथम देवत्व प्राप्त किया तथा जिससे हाथी बलवान होता है, वह तेज हमें यशस्वी करे।
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