अन्ना का जनआंदोलन उनकी टीम के भटकाव के लिए जिम्मेवार
अन्ना हजारे ने जिस पवित्र ध्येय से काले धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत की पवित्र भूमि से शंखनाद किया वह अब उनके द्वारा गठित टीम के सदस्यों की व्यक्तिगत थाथी बनती जा रही है। कारण सही है कि आज उनके साथ जो भी जुड़ रहे हैं वह उसे अपनी पब्लिसिटी का प्लेटफार्म बनाकर उसका इस्तेमाल कर रही है। चाहे बाबा रामदेव की बात हो या अन्य किसी के जुडऩे की।
बाबा रामदेव से साझीदारी के मुद्दे पर अन्ना हजारे और उनके साथियों में मतभेद गहराते जा रहे हैं। इस मामले पर अरविंद केजरीवाल की लगातार बयानबाजी से नाराज अन्ना ने कहा है कि वे उनसे इस बारे में पूछताछ करेंगे। अन्ना और बाबा की साझीदारी को सही ठहराते हुए किरण बेदी ने एलान किया है कि वे रामदेव के धरने में शामिल होंगी।
अन्ना ने एक बार फिर साफ कर दिया कि वे नहीं चाहते कि उनके और रामदेव के बीच कोई मनमुटाव की स्थिति पैदा होती दिखे। केजरीवाल के रामदेव संबंधी बयानों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, 'मैं उनसे इस बारे में पूछूंगा।Ó अन्ना के इस सख्त संकेत के बावजूद उनकी टीम के सदस्यों ने अपने सुर नहीं बदले। उनका कहना था कि बाबा रामदेव के साथ साझा कार्यक्रम नहीं करने का फैसला आंदोलन की कोर कमेटी में ही हो चुका है। ऐसे में जब भी पूछा जाएगा, तो वे इस बात को दोहराने के लिए मजबूर हैं।
इन बयानबाजियों से लोकपाल आंदोलन की एक और प्रमुख सदस्य किरण बेदी ने भी पल्ला झाड़ लिया है। उन्होंने 'दैनिक जागरणÓ से बातचीत में रामदेव के साथ साझीदारी को लेकर किसी भी तरह के सवाल उठाए जाने को गलत बताया। साथ ही रामदेव के तीन जून के धरने में खुद के शामिल होने का एलान भी किया। किरण बेदी ने कहा, 'मुझे समझ नहीं आ रहा कि रामदेव को लेकर इस तरह के प्रश्न क्यों उठाए जा रहे हैं। जब लोकपाल के विरोध में सारे भ्रष्टाचारी एक हो जाते हैं तो भ्रष्टाचार विरोधी क्यों नहीं एकजुट हो सकते?Ó रामदेव के साथ साझा आंदोलन नहीं करने के कोर कमेटी के फैसले की याद दिलाए जाने पर उन्होंने कहा, 'ऐसा फैसला इसलिए किया गया क्योंकि अन्ना और बाबा के तरीके अलग हैं, प्लेटफार्म अलग हैं। संगठन अलग हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम उनकी मंशा पर ही सवाल उठाने लगें।Ó
डॉ राजीव रंजन ठाकुर
Friday, May 11, 2012
Monday, April 9, 2012
साहित्य
अरे साहित्य!
अब तू भूल जा,
अपने स्वर्णिम सिद्धांतों को।
जब तू कहता था,
सर्वे भवन्तु सुखिन:।
छोड़ अपने संस्कारों को,
जिससे तू विभिन्न कालों में,
अपनी गणवेषणा करता था।
तू छोड़ अपनी नीति की नैया,
जब तू भक्ति, रीति व श्रृंगार के,
रसों को पिरोता था।
क्योंकि! अब,
न रहा वह साहित्य,
जिसे साहित्यकारों ने टटोला था।
साहित्य को चाहिए अब मंच,
क्योंकि उसके पंचों को,
नहीं है संच।
उसे चाहिए बरबस आरक्षण
क्योंकि दलितों को मिलता है संरक्षण।
साहित्य भी अब दलित हुआ,
बना उसका दलित मंच।
उस मंच पर काबिज हुए वो,
जिसे न मिला था मंच।
अब ने वे प्रणेता,
झिटकने को तमगा,
पर साहित्य तो हुई बरबस नंगा।
DR.Rajeev Ranjan Thakur
अब तू भूल जा,
अपने स्वर्णिम सिद्धांतों को।
जब तू कहता था,
सर्वे भवन्तु सुखिन:।
छोड़ अपने संस्कारों को,
जिससे तू विभिन्न कालों में,
अपनी गणवेषणा करता था।
तू छोड़ अपनी नीति की नैया,
जब तू भक्ति, रीति व श्रृंगार के,
रसों को पिरोता था।
क्योंकि! अब,
न रहा वह साहित्य,
जिसे साहित्यकारों ने टटोला था।
साहित्य को चाहिए अब मंच,
क्योंकि उसके पंचों को,
नहीं है संच।
उसे चाहिए बरबस आरक्षण
क्योंकि दलितों को मिलता है संरक्षण।
साहित्य भी अब दलित हुआ,
बना उसका दलित मंच।
उस मंच पर काबिज हुए वो,
जिसे न मिला था मंच।
अब ने वे प्रणेता,
झिटकने को तमगा,
पर साहित्य तो हुई बरबस नंगा।
DR.Rajeev Ranjan Thakur
जियारत के बहाने भारत-पाक कूटनीति
अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद़दीन चिश्ती की दरगाह पर जियारत के लिए एक दिवसीय भारत दौरे पर पहुंचे पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी व उनके पुञ विलावल का प्रधानमंञी ने स्वागत किया। मौके पर भारत के प्रधानमंञी मनमोहन सिंह के साथ बैठक के दौरान जरदारी ने कहा कि इस मुकद़दस मुकाम पर आकर मुझे जो रुहानी खुशी महसुस हुई है वो नाकाबिले बयान है। अल्लाह ताला से दुआ है कि वो तमाम इंसानियत के लिए आसानियां पैदा करें। ख्वाजा मोइनुद़दीन चिश्ती की दरगाह पर जियारत के बाद उन्होंने दरगाह के विकास के लिए 10 लाख डालर की राशि देने का एलान किया।
भारतीय प्रधानमंञी द़वारा मुबई हमले के साजिशकर्ता सईद के खिलाफ कडे रूख के बावत जरदारी ने इस मसले पर आगे और बातचीत की आवश्यकता की ओर इंगित किया। जरदारी ने जियारत के बहाने भारत से बंहतर संबंध और दोनों देशों के बीच सियाचीन सहित कई विवादास्पद मुद़दों के समाधान की आवश्यकता जताई।पाक राष्ट्रपति के दौरे से जाहिर हो रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात में रिश्तों को नए आयाम देने की कोशिश की गई। निर्धारित कार्यक्रम को परे रखकर दिए गए साझा बयान में दोनों नेताओं ने संबंधों को सुधारने पर जोर दिया। वार्ता प्रक्रिया के जरिए पुरानी समस्याओं के व्यावहारिक नतीजे निकालने और संबंधों का नया मॉडल बनाने पर रजामंदी जताई।
भारतीय प्रधानमंञी द़वारा मुबई हमले के साजिशकर्ता सईद के खिलाफ कडे रूख के बावत जरदारी ने इस मसले पर आगे और बातचीत की आवश्यकता की ओर इंगित किया। जरदारी ने जियारत के बहाने भारत से बंहतर संबंध और दोनों देशों के बीच सियाचीन सहित कई विवादास्पद मुद़दों के समाधान की आवश्यकता जताई।पाक राष्ट्रपति के दौरे से जाहिर हो रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात में रिश्तों को नए आयाम देने की कोशिश की गई। निर्धारित कार्यक्रम को परे रखकर दिए गए साझा बयान में दोनों नेताओं ने संबंधों को सुधारने पर जोर दिया। वार्ता प्रक्रिया के जरिए पुरानी समस्याओं के व्यावहारिक नतीजे निकालने और संबंधों का नया मॉडल बनाने पर रजामंदी जताई।
Saturday, February 18, 2012
कमल की आभा
कमल तो कमल है।।
चिरंतन जलज है,
शाश्वत अस्तित्व है।
आभा की दमक है,
कमल तो कमल है।।
विशेषण की ललक नहीं,
कीचड़ की ललन है।
जहाँ भी पहुँचती,
सौम्यता की शनक है।
कमल तो कमल है।।
भारती ही कमल है,
विद्या की जनक है।
संस्कृति की झलक है,
मानवता की दमक है।
कमल तो कमल है।।
लक्ष्मी ही कमल है,
वैभवता की जनक है।
श्रृष्टि की ललक है,
इसी का सबब है।
कमल तो कमल है।।
कमल में आभा है,
आभा में कमल नहीं।
पंकज तो शाश्वत है,
आभा में शाश्वतता नहीं।
कमल तो कमल है।।
आभा में अहम् है,
कमल में सौम्यता।
आभा में अकड़ है,
कमल में लोचकता।
कमल तो कमल है।।
कमल में नियम है,
छद्मता नहीं।
आभा में तुष्टता है,
परमार्थता नहीं।
कमल तो कमल है।।
पीयुष है कमल में,
निर्मल है उसकी काया।
आभा है जल में,
कंचन करती हरपल काया।
कमल तो कमल है।।
कमल है निरूपम,
जबकि आभा स्वरूपम्।
आभा देती कमल को,
अपना अनुपम।
कमल तो कमल है।।
कमल है कोमल,
कंचन है उसकी काया।
आभा उसको देती,
हरपल अकिंचन छाया।
कमल तो कमल है।।
आभा में है रोशनी,
तो कमल में उजाला।
दोनों मिलेगी तभी तो,
सार्थक होगी साया।
कमल तो कमल है।।
चिरंतन जलज है,
शाश्वत अस्तित्व है।
आभा की दमक है,
कमल तो कमल है।।
विशेषण की ललक नहीं,
कीचड़ की ललन है।
जहाँ भी पहुँचती,
सौम्यता की शनक है।
कमल तो कमल है।।
भारती ही कमल है,
विद्या की जनक है।
संस्कृति की झलक है,
मानवता की दमक है।
कमल तो कमल है।।
लक्ष्मी ही कमल है,
वैभवता की जनक है।
श्रृष्टि की ललक है,
इसी का सबब है।
कमल तो कमल है।।
कमल में आभा है,
आभा में कमल नहीं।
पंकज तो शाश्वत है,
आभा में शाश्वतता नहीं।
कमल तो कमल है।।
आभा में अहम् है,
कमल में सौम्यता।
आभा में अकड़ है,
कमल में लोचकता।
कमल तो कमल है।।
कमल में नियम है,
छद्मता नहीं।
आभा में तुष्टता है,
परमार्थता नहीं।
कमल तो कमल है।।
पीयुष है कमल में,
निर्मल है उसकी काया।
आभा है जल में,
कंचन करती हरपल काया।
कमल तो कमल है।।
कमल है निरूपम,
जबकि आभा स्वरूपम्।
आभा देती कमल को,
अपना अनुपम।
कमल तो कमल है।।
कमल है कोमल,
कंचन है उसकी काया।
आभा उसको देती,
हरपल अकिंचन छाया।
कमल तो कमल है।।
आभा में है रोशनी,
तो कमल में उजाला।
दोनों मिलेगी तभी तो,
सार्थक होगी साया।
कमल तो कमल है।।
Monday, February 6, 2012
मानव
मानव
अरे मानव!
तू छोड़ दे
अब मानवता की व्याख्या
क्योंकि तू
अब न रहा
मानव
अपनाई दानवता।।
तू मानव!
होगा भी कैसे
क्योंकि अब,
तुझमें दिल नहीं
करता है तू कुकृत्य
जिससे
मानव को संच नहीं।।
बच्चे, बूढ़े और
जवां
सब होते हैं तेरे समा,
तेरी बंदूक की एक बटन
करती है हरपल भयां।।
झूठ, फरेबी
और मक्कारी,
करता तू सबसे
गद्दारी,
अपने अहम की पूत्र्ति हेतु,
ईश्वर को भी देता गाली।।
प्यास बुझाने हेतु
पानी नहीं,
तुझे चाहिए
बरबस खून
इसको पाने पर ही
तुझे मिलता है सुकून।।
जात-पात की बिछी क्यारी
आत्मा ने
जमीर भूला दी
तुझे नहीं अब
मानवता की लेनी दुहाई
अब केवल
खून!
चाहिए भाई।।
अरे मानव! तू
कैसा मानव?
तू तो हुआ अब
बरबस दानव
मानवता छोड़
दानवता अपनाई
सचमुच! क्या यही है
कलियुग की सच्चाई?
डॉ राजीव रंजन ठाकुर
ठाकुर भवन
गुमटी नं-12 के पास
भीखनपुर, भागलपुर
अरे मानव!
तू छोड़ दे
अब मानवता की व्याख्या
क्योंकि तू
अब न रहा
मानव
अपनाई दानवता।।
तू मानव!
होगा भी कैसे
क्योंकि अब,
तुझमें दिल नहीं
करता है तू कुकृत्य
जिससे
मानव को संच नहीं।।
बच्चे, बूढ़े और
जवां
सब होते हैं तेरे समा,
तेरी बंदूक की एक बटन
करती है हरपल भयां।।
झूठ, फरेबी
और मक्कारी,
करता तू सबसे
गद्दारी,
अपने अहम की पूत्र्ति हेतु,
ईश्वर को भी देता गाली।।
प्यास बुझाने हेतु
पानी नहीं,
तुझे चाहिए
बरबस खून
इसको पाने पर ही
तुझे मिलता है सुकून।।
जात-पात की बिछी क्यारी
आत्मा ने
जमीर भूला दी
तुझे नहीं अब
मानवता की लेनी दुहाई
अब केवल
खून!
चाहिए भाई।।
अरे मानव! तू
कैसा मानव?
तू तो हुआ अब
बरबस दानव
मानवता छोड़
दानवता अपनाई
सचमुच! क्या यही है
कलियुग की सच्चाई?
डॉ राजीव रंजन ठाकुर
ठाकुर भवन
गुमटी नं-12 के पास
भीखनपुर, भागलपुर
विष की छड़ी
विष की छड़ी,
घूमती हर घड़ी।
जिन्दगी को बनाती,
है बहुत कड़ी।।
विष की छड़ी...
गर्भ में पली,
छोड़ती अनुभूति।
उद्धिग्न करती रहती,
माता को हर घड़ी।।
विष की छड़ी...
जन्म लेते ही बँटी अनुभूति,
बालक है तो सुखी।
बालिका है तो दु:खी,
कारण कलियुग है यही।।
विष की छड़ी...
नजरों में चढ़ी,
अगर है वो छड़ी।
होगी वो बड़ी,
तो लुटेगी सही।।
विष की छड़ी...
होकर बड़ी,
लगने वो पढ़ी।
सहपाठियों बीच लुटी,
या फिर बंधनों में पड़ी।।
विष की छड़ी...
हो कितनी भी पढ़ी,
कर कुछ भी सकती।
मगर बंधनों में जकड़ी,
टूटती ही रहती।।
विष की छड़ी...
रूढि़वादिता जो तोड़ी,
कहलाने को फ्री।
मगर यह हुई न सही,
कारण, विपदाओं से घिरी।।
विष की छड़ी...
कहने को सही,
है वो फ्री।
मगर रहती वो डरी,
क्योंकि है वो छड़ी।।
विष की छड़ी...
करने सबकुछ लगी,
होने पाँवों पर खड़ी।
कभी बॉस से लुटी,
तो कभी घर में सही।।
विष की छड़ी...
क्या इसलिए वो बनी?
कहलाने को शक्ति।
कि, जब भी चाहो,
उठा लो चोली।।
विष की छड़ी...
नहीं! है वो आदिशक्ति,
सिखलाई मातृभक्ति।
वेदना की प्रतिमूर्ति,
श्रृष्टि की है कड़ी।।
विष की छड़ी...
मातृशक्ति है वो,
भगिनि शक्ति।
पत्नी शक्ति है वो,
सर्वस्व शक्ति।।
विष की छड़ी...
करोगेे उसकी इच्जत,
तो पाओगे जन्नत।
अगर होगी वो उन्नत,
तो दिलाएगी सल्तनत।।
विष की छड़ी...
डॉ राजीव रंजन ठाकुर
ठाकुर भवन
गुमटी नं-12 के पास
भीखनपुर, भागलपुर
घूमती हर घड़ी।
जिन्दगी को बनाती,
है बहुत कड़ी।।
विष की छड़ी...
गर्भ में पली,
छोड़ती अनुभूति।
उद्धिग्न करती रहती,
माता को हर घड़ी।।
विष की छड़ी...
जन्म लेते ही बँटी अनुभूति,
बालक है तो सुखी।
बालिका है तो दु:खी,
कारण कलियुग है यही।।
विष की छड़ी...
नजरों में चढ़ी,
अगर है वो छड़ी।
होगी वो बड़ी,
तो लुटेगी सही।।
विष की छड़ी...
होकर बड़ी,
लगने वो पढ़ी।
सहपाठियों बीच लुटी,
या फिर बंधनों में पड़ी।।
विष की छड़ी...
हो कितनी भी पढ़ी,
कर कुछ भी सकती।
मगर बंधनों में जकड़ी,
टूटती ही रहती।।
विष की छड़ी...
रूढि़वादिता जो तोड़ी,
कहलाने को फ्री।
मगर यह हुई न सही,
कारण, विपदाओं से घिरी।।
विष की छड़ी...
कहने को सही,
है वो फ्री।
मगर रहती वो डरी,
क्योंकि है वो छड़ी।।
विष की छड़ी...
करने सबकुछ लगी,
होने पाँवों पर खड़ी।
कभी बॉस से लुटी,
तो कभी घर में सही।।
विष की छड़ी...
क्या इसलिए वो बनी?
कहलाने को शक्ति।
कि, जब भी चाहो,
उठा लो चोली।।
विष की छड़ी...
नहीं! है वो आदिशक्ति,
सिखलाई मातृभक्ति।
वेदना की प्रतिमूर्ति,
श्रृष्टि की है कड़ी।।
विष की छड़ी...
मातृशक्ति है वो,
भगिनि शक्ति।
पत्नी शक्ति है वो,
सर्वस्व शक्ति।।
विष की छड़ी...
करोगेे उसकी इच्जत,
तो पाओगे जन्नत।
अगर होगी वो उन्नत,
तो दिलाएगी सल्तनत।।
विष की छड़ी...
डॉ राजीव रंजन ठाकुर
ठाकुर भवन
गुमटी नं-12 के पास
भीखनपुर, भागलपुर
Tuesday, December 13, 2011
अंग परिक्रमा
गंगा के पावन तीरों पर
बसा है अंग प्यारा।
मंदराचल नें मथ दिया
सिंधु को न्यारा।
मधुसूदन नें बास लिया
अंग में हमारा।
यहीं जहण्णु में तप किया
अजगैवी के किनारे।
दानवीर कर्ण और
बुद्ध भी हमारे।
अरबिन्दो का रणघोष
दीपांकर के साये।
टैगोर की कलम चली
सभी नें उसे गाया।
शरदचंद की अछूत कन्या
सभी को है भाया।
दिनकर नें हुंकार भरी, और
हिमालय तक को यहां लाया।
विक्रमशिला की श्रेष्ठता ने
ज्ञान का अचरज फैलाया।
सिल्क की श्रेष्ठता ने
समृद्ध इसे बनाया।
दान दे बनैली ने
एक शिक्षण संस्थान बनबाया।
इसी से सन साठ में
भागलपुर विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया।
मिली-जुली संस्कृति, और
सर्वधर्म समभाव है यहां समाया।
तमसो मां ज्योर्तिगमय का
उद्ेश्य इसने बनाया।
धन्य हे अंग भूमि
तूने प्रकाश जो फैलाया।
डा. राजीव रंजन ठाकुर
बसा है अंग प्यारा।
मंदराचल नें मथ दिया
सिंधु को न्यारा।
मधुसूदन नें बास लिया
अंग में हमारा।
यहीं जहण्णु में तप किया
अजगैवी के किनारे।
दानवीर कर्ण और
बुद्ध भी हमारे।
अरबिन्दो का रणघोष
दीपांकर के साये।
टैगोर की कलम चली
सभी नें उसे गाया।
शरदचंद की अछूत कन्या
सभी को है भाया।
दिनकर नें हुंकार भरी, और
हिमालय तक को यहां लाया।
विक्रमशिला की श्रेष्ठता ने
ज्ञान का अचरज फैलाया।
सिल्क की श्रेष्ठता ने
समृद्ध इसे बनाया।
दान दे बनैली ने
एक शिक्षण संस्थान बनबाया।
इसी से सन साठ में
भागलपुर विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया।
मिली-जुली संस्कृति, और
सर्वधर्म समभाव है यहां समाया।
तमसो मां ज्योर्तिगमय का
उद्ेश्य इसने बनाया।
धन्य हे अंग भूमि
तूने प्रकाश जो फैलाया।
डा. राजीव रंजन ठाकुर
Subscribe to:
Posts (Atom)