सहमति से संबंध बनाने की उम्र 16 साल करने की मंत्रिमंडलीय समूह की सिफारिश पर केंद्रीय मंत्रिमंडल की मुहर लग गई है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में महिला का पीछा करने और अश्लील इशारा करने को गैरजमानती अपराध की श्रेणी में रखने का फैसला किया गया है। मंत्रिमंडल से मंजूरी के बाद संशोधित रूप में अपराध कानून संशोधन विधेयक को संसद में पेश किया जाएगा।
ज्ञात हो कि मंत्रियों के बीच उत्पन्न इस मुद्दे पर विवाद दूर करने की जिम्मेदारी पी. चिदंबरम की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंड़लीय समूह को सौंपी गई थी जिसमें सहमति से संसर्ग की उम्र 18 साल से घटाकर 16 साल करने पर एकराय बनी। साथ ही दुष्कर्म के अपराध को महिलाओं के साथ जोड़कर बलात्कार शब्द के प्रयोग का फैसले के साथ ही तेजाब हमले पर कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। दुष्कर्म का दोषी पाए जाने पर कम से कम 20 साल की सजा दी जाएगी जिसे ताउम्र सजा में बदला जा सकेगा। दुष्कर्म पीडि़ता की मौत या उसके कौमा में चले जाने की स्थिति में मौत की सजा का भी प्रावधान किया गया है। विधेयक में महिला का पीछा करने और अश्लील इशारे करने को गैरजमानती श्रेणी में रखने का फैसला किया गया है। लेकिन कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए फर्जी शिकायत के मामले में सजा के प्रावधान को विधेयक से हटा लिया गया है।
इस बाबत मेरा मानना है कि इस कानून के बन जाने से भारतीय संविधान की धारा 12 व 13 जिसके तहत कानून के समक्ष समानता व कानून के समक्ष समान न्याय के अधिकारों का उल्लंघन होगा। इतना ही नहीं कानून ने जहां वोट डालने,न्यायिक निर्णय,न्यायिक प्रक्रिया आदि के लिए बालिग होने की उम्र 18 वर्ष रखा है यानि उक्त कार्य के लिए इसी उम्र के बाद समझदारी आती है तो सेक्स के लिए आपसी सहमति की उम्र 16 कैसे जायज हो सकता है। यहीं नहीं आइपीसी की धारा 375 के तहत जहां सेक्स के लिए उम्र 16 वर्ष तय की गई है वहीं जुबेनाइल जस्टिस ऐक्ट के तहत इसे 18 वर्ष माना गया है। आइपीसी की धारा 354 के तहत स्त्री के सतीत्व का उल्ल्ंघन होने पर दो साल की सजा व जुर्माना या दोनों,धारा-509 के तहत शब्द,भाव-भंगिमा व ऐसी किसी भी हरकत जिससे स्त्री के सम्मान को ठेस पहुंचता हो तो दोषी को एक साल की सजा या जुर्माना या दोनो हो सकता है। इससे साफ जाहिर है कि देश मे कानून मौजूद है बस जरूरत है उसे राजनीतिक परिवेश से निकालकर सच्चे दिल से लागू करने की,समाज को सही दिशा देने की।
नहीं तो मौजूदा परिवेश में इस कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए फर्जी शिकायत के मामले में सजा के प्रावधान को विधेयक से हटा लिया गया है जिस कारण इसका 98 फीसद मामलों में दुरूपयोग ही होगा। इससे पुरूष समाज और एग्रेसिव होगा और महिलाओं के प्रति अपराध की विभत्सता में और वृद्धि होगी। क्योंकि दिल्ली दुष्कर्म की घटना के बाद या इससे पहले कोलकाता में दुष्कर्म के आरोपी धन्नंजय चटर्जी को फांसी दिए जाने के बाद विराम नहीं तो कम से कम दुष्कर्म की घटनाओं पर अंकुश अवश्य लग जाना चाहिए था।
Monday, March 18, 2013
Friday, December 21, 2012
शर्मसार मानवता
झारखंड प्रांत के लोहरदगा जिले में दो संप्रदायों के प्रेमी युगल द्वारा प्रेम विवाह करने के प्रयासों से नाराज युवती के परिजनों ने जिस प्रकार दोनों को धोखे में रखकर मार डाला(हालांकि पीडि़त बच गई) वह अत्यंत शर्मनाक घटना है। हैवानियत की हद तो तब पार कर गई कि लड़की के पिता और मामा हत्या कराने के पहले युवती के साथ अन्यान्य लोगों द्वारा किए जा रहे दुष्कर्म के गवाह भी बने। दोनों ने मिलकर परंपरा, संस्कृति, सभ्यता और रिश्ते तक का कत्ल कराया। दिल्ली में एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म और उसके साथी युवक समेत उस पर शारीरिक अत्याचार की घटना पूरे देश की सुर्खियां बन जाती है। लेकिन महानगरों से इतर अन्य राज्यों,जिलों व कसबों में उससे भी अधिक हैवानियत भरी घटना पर समाज और शासन-प्रशासन का चरित्र बहुत तसल्ली नहीं देता। वैश्वीकरण के इस दौर में समाज में आ रहे खुलापन के बीच परंपरावादियों द्वारा ऑनर किलिंग की घटनाओं को अंजाम दिए जाने पर कठोर कार्रवाई की आवश्यकता बनी हुई है। कोर्ट कह चुका है कि अपराधी को उचित दंड देकर समाज की न्याय के लिए पुकार का जवाब दिया जाना चाहिए। कानून का उद्देश्य समाज की रक्षा और अपराधी को भयभीत कर अपराध करने से रोकना है।
डाक्टर राजीव रंजन ठाकुर
Tuesday, November 20, 2012
छठ के मौके पर पटना के अदालतगंज घाट पर घटी घटना से दुखी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने देर रात मीडियाकर्मियों को बुलाकर बात की। उन्होंने कहा कि यह हादसा काफी दुखदायी है। मैं इस घटना से अत्यधिक मर्माहत हूं। हादसे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। मेरी गहरी संवेदना मृतकों के परिजनों के लिए है। उन्होंने कहा-'विपक्ष की बातों का कोई मतलब है? मैं इसकी नोटिस भी नहीं लेता। वे अपना जमाना भूल गए। छठ में ही नारियल घाट (दानापुर) की नाव दुर्घटना में 80 लोग मरे थे। लेकिन अभी यह सब कहने-सुनने का मौका नहीं है। इंसानियत के नाते मेरी सबसे अपील है कि वे धीरज व संयम से काम लें। ... विपक्ष ने तो मधुबनी कांड को भी मुद्दा बना लिया था। क्या हुआ, कौन नहीं जानता है? वे तो लोग यह भी कह रहे हैं कि चचरी के पुल में करोड़ों का घोटाला कर लिया। बताइए, ये क्या है?Ó यह हादसा हमारे लिए बड़ी सबक है। इससे नसीहत ले हम आगे की कार्रवाई करेंगे। उन्होंने कहा-'मैं खुद घाटों का निरीक्षण कर लौटा तो करीब सात बजे मुझे हादसे की जानकारी मिली। तत्काल सभी वरीय अधिकारियों को मौके पर जाकर राहत एवं बचाव कार्य करने तथा घाट पर फंसे लोगों को सुरक्षित निकालकर उन्हें घर तक पहुंचाने, घायलों की चिकित्सा कराने का निर्देश दिया। भगदड़ क्यों हुई, इसका पता लगाने के लिए प्रधान सचिव गृह से जांच कराई जा रही है। वे सभी बिन्दुओं पर गहराई से जांच कर रिपोर्ट सौंपेंगे। उन्होंने घटनास्थल का भी निरीक्षण किया है। जांच रिपोर्ट आने के बाद जिम्मेदारी निर्धारित कर कार्रवाई की जाएगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि सूचना मिली थी कि बिजली का तार गिरने से यह हादसा हुआ। बिजली बोर्ड के सदस्य को घटनास्थल पर भेजा गया। प्रारंभिक जांच से यह स्पष्ट हुआ कि चचरी पुल के टूटने से हादसा नहीं हुआ, न ही बिजली से कोई दुर्घटना हुई। पीपा पुल से घाट की तरफ ऊपर रास्ते में भगदड़ हुआ, जिसके कारण यह घटना घटी।
क्या सीएम का इतना कह देने से हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों का राहत मिलेगी। यह तो समय ही बताएगा। हां यह जरूर है कि हर घटना को हम जीवन का सबक मानते हैं।
Thursday, November 1, 2012
राजनीतिक आत्ममंथन
उचित समय है यह,
करने का राजनीतिक पुनर्विलोकन,
राजनीतिज्ञ आत्ममंथन करें,
और करें अवलोकन !!
लंबी जंग और कुर्बानी दी,
मातृभूमि की रक्षा को।
तब पाई थी स्वाधीनता,
और जाने सर्वस्व को !!
पाई स्वाधीनता अवश्य,
मगर उलझ गए गोरे गालों में।
माता के हृदय को विभक्त किया,
और बंट गए दो राष्ट्रों में !!
हृदय विदृर्ण हुआ तब-तब,
जब-जब सपूतों ने खेली खून की होली
कहलानें को स्वतंत्र हुए,
अपनाई आर्थिक ऋण की झोली !!
लोकतंत्र की आंधी आई थी,
बीते लगभग बरस साठ
अपने साथ सपन लाई थी,
सबकुछ होगा सबके पास !!
वादों के बोझों को जनता,
आज रही है कंधों झेल
हे राजनीतिज्ञों! कब दोगे इससे मुक्ति,
जब हो जाएगा हर्ट फेल !!
लोकतंत्र की इच्जत उतरी,
बीबी ने भी कुर्सी पकड़ ली।
दांव लगाई और चारा खाई
सफल राजनीतिज्ञ भी बन गया भाई !!
मंदिर बॉटी, मस्जिद बॉटी,
और बॉटे गुरुद्वारे।
इससे भी न हुआ तो,
अगड़े-पिछड़ों में बॉट दिए सारे !!
तुम भी काटो, हम भी काटें,
बिना लिए लगाम।
सत्ता को कैसे भी पाओ,
चाहे जाए हजारों जान !!
लोकतंत्र की नीति बनाओ,
सदन में मल्लयुद्ध कराओ।
सत्ताधारी चाहे जो भी करें,
होगे वो बदनाम !!
कहलाने को लोकतांत्रिक कहलाते,
इसकी व्यवस्था को न ला पाते।
समय-समय पर बहस करवाते,
लेते रहते हजारों जान !!
आओ समय है समझें-संभले,
बिना किसी अभिमान।
राजनीतिज्ञों! कहो अभी भी,
कितनें लोगे जान? !!
उचित समय है यह,
करने का राजनीतिक पुनर्विलोकन।
राजनीतिज्ञ आत्ममंथन करें,
और करें अवलोकन !।
करने का राजनीतिक पुनर्विलोकन,
राजनीतिज्ञ आत्ममंथन करें,
और करें अवलोकन !!
लंबी जंग और कुर्बानी दी,
मातृभूमि की रक्षा को।
तब पाई थी स्वाधीनता,
और जाने सर्वस्व को !!
पाई स्वाधीनता अवश्य,
मगर उलझ गए गोरे गालों में।
माता के हृदय को विभक्त किया,
और बंट गए दो राष्ट्रों में !!
हृदय विदृर्ण हुआ तब-तब,
जब-जब सपूतों ने खेली खून की होली
कहलानें को स्वतंत्र हुए,
अपनाई आर्थिक ऋण की झोली !!
लोकतंत्र की आंधी आई थी,
बीते लगभग बरस साठ
अपने साथ सपन लाई थी,
सबकुछ होगा सबके पास !!
वादों के बोझों को जनता,
आज रही है कंधों झेल
हे राजनीतिज्ञों! कब दोगे इससे मुक्ति,
जब हो जाएगा हर्ट फेल !!
लोकतंत्र की इच्जत उतरी,
बीबी ने भी कुर्सी पकड़ ली।
दांव लगाई और चारा खाई
सफल राजनीतिज्ञ भी बन गया भाई !!
मंदिर बॉटी, मस्जिद बॉटी,
और बॉटे गुरुद्वारे।
इससे भी न हुआ तो,
अगड़े-पिछड़ों में बॉट दिए सारे !!
तुम भी काटो, हम भी काटें,
बिना लिए लगाम।
सत्ता को कैसे भी पाओ,
चाहे जाए हजारों जान !!
लोकतंत्र की नीति बनाओ,
सदन में मल्लयुद्ध कराओ।
सत्ताधारी चाहे जो भी करें,
होगे वो बदनाम !!
कहलाने को लोकतांत्रिक कहलाते,
इसकी व्यवस्था को न ला पाते।
समय-समय पर बहस करवाते,
लेते रहते हजारों जान !!
आओ समय है समझें-संभले,
बिना किसी अभिमान।
राजनीतिज्ञों! कहो अभी भी,
कितनें लोगे जान? !!
उचित समय है यह,
करने का राजनीतिक पुनर्विलोकन।
राजनीतिज्ञ आत्ममंथन करें,
और करें अवलोकन !।
Saturday, October 13, 2012
जीने की सोच
जिंदगी जीना और ढोना दो अलग-अलग सोच हैं। एक में आप आशावादी,साम-दाम-दंड और भेद से काम लेते हैं वहीं दूसरे में आपकी सोच निराशावादी और शोषित मानसिकता जैसी होती है जिस पर किसी और का शासन कायम होता हैं। आप जिंदगी से भयभीत और डरे होते हैं।
लेकिन सच है कि जो दौडता है वही जीत या हार सकता है। अगर आप दौडेंगे ही नहीं तो जिंदगी बोझ तो लगेगी ही। निष्काम कर्म करते रहें । सही रास्ते -सोच व दिशानिर्देशन इसके मुख्य अवयव है। कहा भी गया है कि भगवान भी उसी की सहयाता करता है जो दूसरों को रास्ता दिखाता है। इसलिए चाह के पहले दान व त्याग का भाव अत्यावश्यक है। क्योकि आप भी जानते हैं कि ढलते सूर्य को कोई प्रणाम नहीं करता । ऊर्जा तो उदयिमान सूर्य से ही मिलती है। जब तक आप तरोताजा रहेंगे आपकी पूछ होगी अन्यथा जिंदगी का सबसे खास साथी आपकी पत्नी भी आपको ताने देगी और हो सकता है कि उस मुकाम पर आपका साथ भी छोड दे। इसलिए जब तक जिएं कर्मवीर व शेर बनकर ।
डां राजीव रंजन ठाकुर
डां राजीव रंजन ठाकुर
Friday, May 11, 2012
अन्ना का जनआंदोलन उनकी टीम के भटकाव के लिए जिम्मेवार
अन्ना का जनआंदोलन उनकी टीम के भटकाव के लिए जिम्मेवार
अन्ना हजारे ने जिस पवित्र ध्येय से काले धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत की पवित्र भूमि से शंखनाद किया वह अब उनके द्वारा गठित टीम के सदस्यों की व्यक्तिगत थाथी बनती जा रही है। कारण सही है कि आज उनके साथ जो भी जुड़ रहे हैं वह उसे अपनी पब्लिसिटी का प्लेटफार्म बनाकर उसका इस्तेमाल कर रही है। चाहे बाबा रामदेव की बात हो या अन्य किसी के जुडऩे की।
बाबा रामदेव से साझीदारी के मुद्दे पर अन्ना हजारे और उनके साथियों में मतभेद गहराते जा रहे हैं। इस मामले पर अरविंद केजरीवाल की लगातार बयानबाजी से नाराज अन्ना ने कहा है कि वे उनसे इस बारे में पूछताछ करेंगे। अन्ना और बाबा की साझीदारी को सही ठहराते हुए किरण बेदी ने एलान किया है कि वे रामदेव के धरने में शामिल होंगी।
अन्ना ने एक बार फिर साफ कर दिया कि वे नहीं चाहते कि उनके और रामदेव के बीच कोई मनमुटाव की स्थिति पैदा होती दिखे। केजरीवाल के रामदेव संबंधी बयानों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, 'मैं उनसे इस बारे में पूछूंगा।Ó अन्ना के इस सख्त संकेत के बावजूद उनकी टीम के सदस्यों ने अपने सुर नहीं बदले। उनका कहना था कि बाबा रामदेव के साथ साझा कार्यक्रम नहीं करने का फैसला आंदोलन की कोर कमेटी में ही हो चुका है। ऐसे में जब भी पूछा जाएगा, तो वे इस बात को दोहराने के लिए मजबूर हैं।
इन बयानबाजियों से लोकपाल आंदोलन की एक और प्रमुख सदस्य किरण बेदी ने भी पल्ला झाड़ लिया है। उन्होंने 'दैनिक जागरणÓ से बातचीत में रामदेव के साथ साझीदारी को लेकर किसी भी तरह के सवाल उठाए जाने को गलत बताया। साथ ही रामदेव के तीन जून के धरने में खुद के शामिल होने का एलान भी किया। किरण बेदी ने कहा, 'मुझे समझ नहीं आ रहा कि रामदेव को लेकर इस तरह के प्रश्न क्यों उठाए जा रहे हैं। जब लोकपाल के विरोध में सारे भ्रष्टाचारी एक हो जाते हैं तो भ्रष्टाचार विरोधी क्यों नहीं एकजुट हो सकते?Ó रामदेव के साथ साझा आंदोलन नहीं करने के कोर कमेटी के फैसले की याद दिलाए जाने पर उन्होंने कहा, 'ऐसा फैसला इसलिए किया गया क्योंकि अन्ना और बाबा के तरीके अलग हैं, प्लेटफार्म अलग हैं। संगठन अलग हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम उनकी मंशा पर ही सवाल उठाने लगें।Ó
डॉ राजीव रंजन ठाकुर
Monday, April 9, 2012
साहित्य
अरे साहित्य!
अब तू भूल जा,
अपने स्वर्णिम सिद्धांतों को।
जब तू कहता था,
सर्वे भवन्तु सुखिन:।
छोड़ अपने संस्कारों को,
जिससे तू विभिन्न कालों में,
अपनी गणवेषणा करता था।
तू छोड़ अपनी नीति की नैया,
जब तू भक्ति, रीति व श्रृंगार के,
रसों को पिरोता था।
क्योंकि! अब,
न रहा वह साहित्य,
जिसे साहित्यकारों ने टटोला था।
साहित्य को चाहिए अब मंच,
क्योंकि उसके पंचों को,
नहीं है संच।
उसे चाहिए बरबस आरक्षण
क्योंकि दलितों को मिलता है संरक्षण।
साहित्य भी अब दलित हुआ,
बना उसका दलित मंच।
उस मंच पर काबिज हुए वो,
जिसे न मिला था मंच।
अब ने वे प्रणेता,
झिटकने को तमगा,
पर साहित्य तो हुई बरबस नंगा।
DR.Rajeev Ranjan Thakur
अब तू भूल जा,
अपने स्वर्णिम सिद्धांतों को।
जब तू कहता था,
सर्वे भवन्तु सुखिन:।
छोड़ अपने संस्कारों को,
जिससे तू विभिन्न कालों में,
अपनी गणवेषणा करता था।
तू छोड़ अपनी नीति की नैया,
जब तू भक्ति, रीति व श्रृंगार के,
रसों को पिरोता था।
क्योंकि! अब,
न रहा वह साहित्य,
जिसे साहित्यकारों ने टटोला था।
साहित्य को चाहिए अब मंच,
क्योंकि उसके पंचों को,
नहीं है संच।
उसे चाहिए बरबस आरक्षण
क्योंकि दलितों को मिलता है संरक्षण।
साहित्य भी अब दलित हुआ,
बना उसका दलित मंच।
उस मंच पर काबिज हुए वो,
जिसे न मिला था मंच।
अब ने वे प्रणेता,
झिटकने को तमगा,
पर साहित्य तो हुई बरबस नंगा।
DR.Rajeev Ranjan Thakur
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