Thursday, October 6, 2016

वेद सार-73

औ शं नो मित्र: शं वरूण: शं नो भवत्वय्र्थमा ।
शं न इन्द्रो बृहस्पति: शं नो विष्णुरूरूक्रम ।।

                                                                        ऋग्वेद:-1/6/18/9







भावार्थ : -
शम् - सत्यसुखदायक
न: - हमको
मित्र : - मंत्रल प्रदेश्वर
वरूण - सर्वोत्कृष्ठ / स्वीकरणीय
भक्तु - हो
अर्यमा- पक्षपात रहित धर्म न्यायकारी  / यमराज
इन्द्र - परमैश्वर्यवान इन्दे्रश्वर
बृहस्पति: - महाविद्यावाचोधिपते वृहस्पति - सबसे बड़े सुख देने वाला विष्णु- सर्वव्यापक
उरुक्रम:- अनंतपराक्रमेश्वर।

व्याख्या:- हे मंगलप्रदेश्वर। आप सर्वथा सब के निश्चित मित्र हो । हमको सत्यसुखदायक सर्वदा हो। हे सर्वोत्कृष्ट, स्वीकरणीय वरेश्वर आप सब से परमोत्तम हो। इसलिए आप हमको परमसुखदायक हो। हे पक्षपात रहित धम्र्मन्यायकारिन आप यमराज हो इसलिए हमारे लिए न्याययुक्त सुख देने वाले आप ही हो। आप हमको परमश्वर्य युक्त शीघ्र स्थिर सुख दीजिए।
हे महाविद्यावाचोधिपते बृहस्पते परमात्मन। हमलोगों को सबसे बड़े सुख को देने वाले आप ही हो। हे सर्वव्यापक अनंतपराक्रमेश्वर विष्णो आप हमको अनंत सुख दो। जो कुछ मांगेंगे आप से ही मांगेंगे। सब सुखों को देने वाले आप के बिना कोई नहीं है। सर्वथा हमलोगों को आप का ही आशय है, अन्य किसी का नहीं। क्योंकि सर्वशक्तिमान न्यायकारी दयामय सबसे बड़े पिता को छोड़ के नीचे का आश्रय हम कभी न करेंगे। आप का तो स्वभाव ही है कि आंगीकृत को कभी नहीं छोड़ते सो आप सदैव हमको सुख देंगे, यह हमको दृढ़ निश्चय है।

Sunday, October 2, 2016

हवन विधि

सनातन धर्म में किसी भी धार्मिक कार्य के बाद हवन करना महत्‍वपूर्ण माना जाता है। हवन अगर किसी देवी से संबंधित हो तो वेदी त्रिभुजाकार और देवतओं से संबंधित हो तो वेदी वर्गाकार बनाना चाहिए।

जल से आचमन करने के मंत्र

 अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।१।
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा ।२।
ॐ सत्यं यश: श्रीर्मयि काश्री: श्रयतां स्वाहा ।३।

जल से अंग स्पर्श करने के मंत्र
इसका प्रयोजन है-शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जगाना ताकि यज्ञ जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके । बाएँ हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की उँगलियों को उनमें भिगोकर बताए गए स्थान को मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें ।
इस मंत्र से मुख का स्पर्श करें
ॐ वाङ्म आस्येऽस्तु ॥
इस मंत्र से नासिका के दोनों भाग
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु ॥
इससे दोनों आँखें
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु ॥
इससे दोनों कान
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु ॥
इससे दोनों भुजाऐं
ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु ॥
इससे दोनों जंघाएं
ॐ ऊर्वोर्म ओजोऽस्तु ॥
इससे सारे शरीर पर जल का मार्जन करें
ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि तनूस्तन्वा में सह सन्तु ॥
मंत्रार्थ – हे रक्षक परमेश्वर! मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरे मुख में वाक् इन्द्रिय पूर्ण आयुपर्यन्त स्वास्थ्य एवं सामर्थ्य सहित विद्यमान रहे।
हे रक्षक परमेश्वर! मेरे दोनों नासिका भागों में प्राणशक्ति पूर्ण आयुपर्यन्त स्वास्थ्य एवं सामर्थ्यसहित विद्यमान रहे। हे रक्षक परमेश्वर! मेरे दोनों आखों में दृष्टिशक्ति पूर्ण आयुपर्यन्त स्वास्थ्य एवं सामर्थ्यसहित विद्यमान रहे। हे रक्षक परमेश्वर! मेरे दोनों कानों में सुनने की शक्ति पूर्ण आयुपर्यन्त स्वास्थ्य एवं सामर्थ्यसहित विद्यमान रहे। हे रक्षक परमेश्वर! मेरी भुजाओं में पूर्ण आयुपर्यन्त बल विद्यमान रहे। हे रक्षक परमेश्वर! मेरी जंघाओं में बल-पराक्रम सहित सामर्थ्य पूर्ण आयुपर्यन्त विद्यमान रहे। हे रक्षक परमेश्वर! मेरा शरीर और अंग-प्रत्यंग रोग एवं दोष रहित बने रहें, ये अंग-प्रत्यंग मेरे शरीर के साथ सम्यक् प्रकार संयुक्त हुए सामर्थ्य सहित विद्यमान रहें।

प्रार्थना 

ॐ विश्वानी देव सवितर्दुरितानि परासुव ।
यद भद्रं तन्न आ सुव ॥१॥
व्‍याख्‍या – हे सब सुखों के दाता ज्ञान के प्रकाशक सकल जगत के उत्पत्तिकर्ता एवं समग्र ऐश्वर्ययुक्त परमेश्वर! आप हमारे सम्पूर्ण दुर्गुणों, दुर्व्यसनों और दुखों को दूर कर दीजिए, और जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव, सुख और पदार्थ हैं, उसको हमें भलीभांति प्राप्त कराइये।

हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत् ।
स दाघार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥२॥
व्‍याख्‍या– सृष्टि के उत्पन्न होने से पूर्व और सृष्टि रचना के आरम्भ में स्वप्रकाशस्वरूप और जिसने प्रकाशयुक्त सूर्य, चन्द्र, तारे, ग्रह-उपग्रह आदि पदार्थों को उत्पन्न करके अपने अन्दर धारण कर रखा है, वह परमात्मा सम्यक् रूप से वर्तमान था। वही उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत का प्रसिद्ध स्वामी केवल अकेला एक ही था। उसी परमात्मा ने इस पृथ्वीलोक और द्युलोक आदि को धारण किया हुआ है, हम लोग उस सुखस्वरूप, सृष्टिपालक, शुद्ध एवं प्रकाश-दिव्य-सामर्थ्य युक्त परमात्मा की प्राप्ति के लिये ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास व हव्य पदार्थों द्वारा विशेष भक्ति करते हैं। 

य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवा: ।
यस्य छायाऽमृतं यस्य मृत्यु: कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥३॥
व्‍याख्‍या – जो परमात्मा आत्मज्ञान का दाता शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक बल का देने वाला है, जिसकी सब विद्वान लोग उपासना करते हैं, जिसकी शासन, व्यवस्था, शिक्षा को सभी मानते हैं, जिसका आश्रय ही मोक्षसुखदायक है, और जिसको न मानना अर्थात भक्ति न करना मृत्यु आदि कष्ट का हेतु है, हम लोग उस सुखस्वरूप एवं प्रजापालक शुद्ध एवं प्रकाशस्वरूप, दिव्य सामर्थ्य युक्त परमात्मा की प्राप्ति के लिये ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास व हव्य पदार्थों द्वारा विशेष भक्ति करते हैं।

य: प्राणतो निमिषतो महित्वैक इन्द्राजा जगतो बभूव।
य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पद: कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥४॥
व्‍याख्‍या– जो प्राणधारी चेतन और अप्राणधारी जड जगत का अपनी अनंत महिमा के कारण एक अकेला ही सर्वोपरी विराजमान राजा हुआ है, जो इस दो पैरों वाले मनुष्य आदि और चार पैरों वाले पशु आदि प्राणियों की रचना करता है और उनका सर्वोपरी स्वामी है, हम लोग उस सुखस्वरूप एवं प्रजापालक शुद्ध एवं प्रकाशस्वरूप, दिव्यसामर्थ्ययुक्त परमात्मा की प्रप्ति के लिये योगाभ्यास एवं हव्य पदार्थों द्वारा विशेष भक्ति करते हैं ।

येन द्यौरुग्रा पृथिवी च द्रढा येन स्व: स्तभितं येन नाक: ।
यो अन्तरिक्षे रजसो विमान: कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥५॥
व्‍याख्‍या – जिस परमात्मा ने तेजोमय द्युलोक में स्थित सूर्य आदि को और पृथिवी को धारण कर रखा है, जिसने समस्त सुखों को धारण कर रखा है, जिसने मोक्ष को धारण कर रखा है, जो अंतरिक्ष में स्थित समस्त लोक-लोकान्तरों आदि का विशेष नियम से निर्माता धारणकर्ता, व्यवस्थापक एवं व्याप्तकर्ता है, हम लोग उस शुद्ध एवं प्रकाशस्वरूप, दिव्यसामर्थ्ययुक्त परमात्मा की प्रप्ति के लिये ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास एवं हव्य पदार्थों द्वारा विशेष भक्ति करते हैं ।

प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परिता बभूव ।
यत्कामास्ते जुहुमस्तनो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥६॥
व्‍याख्‍या – हे सब प्रजाओं के पालक स्वामी परमत्मन! आपसे भिन्न दूसरा कोई उन और इन अर्थात दूर और पास स्थित समस्त उत्पन्न हुए जड-चेतन पदार्थों को वशीभूत नहीं कर सकता, केवल आप ही इस जगत को वशीभूत रखने में समर्थ हैं। जिस-जिस पदार्थ की कामना वाले हम लोग अपकी योगाभ्यास, भक्ति और हव्यपदार्थों से स्तुति-प्रार्थना-उपासना करें उस-उस पदार्थ की हमारी कामना सिद्ध होवे, जिससे की हम उपासक लोग धन-ऐश्वर्यों के स्वामी होवें ।

स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।
यत्र देवा अमृतमानशाना स्तृतीये घामन्नध्यैरयन्त ॥७॥
व्‍याख्‍या– वह परमात्मा हमारा भाई और सम्बन्धी के समान सहायक है, सकल जगत का उत्पादक है, वही सब कामों को पूर्ण करने वाला है। वह समस्त लोक-लोकान्तरों को, स्थान-स्थान को जानता है। यह वही परमात्मा है जिसके आश्रय में योगीजन मोक्ष को प्राप्त करते हुए, मोक्षानन्द का सेवन करते हुए तीसरे धाम अर्थात परब्रह्म परमात्मा के आश्रय से प्राप्त मोक्षानन्द में स्वेच्छापूर्वक विचरण करते हैं। उसी परमात्मा की हम भक्ति करते हैं।

अग्ने नय सुपथा राय अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेँम ॥८॥
व्‍याख्‍या – हे ज्ञानप्रकाशस्वरूप, सन्मार्गप्रदर्शक, दिव्यसामर्थयुक्त परमात्मन! हमें ज्ञान-विज्ञान, ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति कराने के लिये धर्मयुक्त, कल्याणकारी मार्ग से ले चल। आप समस्त ज्ञानों और कर्मों को जानने वाले हैं। हमसे कुटिलतायुक्त पापरूप कर्म को दूर कीजिये । इस हेतु से हम आपकी विविध प्रकार की और अधिकाधिक स्तुति-प्रार्थना-उपासना सत्कार व नम्रतापूर्वक करते हैं।

 दीपक जलाने का मंत्र

ॐ भूर्भुव: स्व: ॥
व्‍व्‍याख्‍या – हे सर्वरक्षक परमेश्वर! आप सब के उत्पादक, प्राणाधार सब दु:खों को दूर करने वाले सुखस्वरूप एवं सुखदाता हैं। आपकी कृपा से मेरा यह अनुष्ठान सफल होवे। अथवा हे ईश्वर आप सत,चित्त, आनन्दस्वरूप हैं। आपकी कृपा से यह यज्ञीय अग्नि पृथिवीलोक में, अन्तरिक्ष में, द्युलोक में विस्तीर्ण होकर लोकोपकारक सिद्ध होवे।

 यज्ञ कुण्ड में अग्नि स्थापित करने का मंत्र

ॐ भूर्भुव: स्वर्द्यौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा ।
तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाद्यायादधे ॥
व्‍याख्‍या – हे सर्वरक्षक सबके उत्पादक और प्राणाधार दुखविनाशक सुखस्वरूप एवं सुखप्रदाता परमेश्वर! आपकी कृपा से मैं महत्ता या गरिमा में द्युलोक के समान, श्रेष्ठता या विस्तार में पृथिवी लोक के समान हो जाऊं । देवयज्ञ की आधारभूमि पृथिवी! के तल पर हव्य द्रव्यों का भक्षण करने वाली यज्ञीय अग्नि को, भक्षणीय अन्न एवं धर्मानुकूल भोगों की प्राप्ति के लिए तथा भक्षण सामर्थ्य और भोग सामर्थ्य प्राप्ति के लिए यज्ञकुण्ड में स्थापित करता हूँ ।

 अग्नि प्रदीप्त करने का मंत्र

ॐ उद् बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहित्व्मिष्टापूर्ते सं सृजेथामयं च ।
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ॥
व्‍याख्‍या- सर्वरक्षक परमेश्वर का स्मरण करता हुअ यहाँ कामना करता हूँ कि हे यज्ञाग्ने ! तू भलीभांति उद्दीप्त हो, और प्रत्येक समिधा को प्रज्वलित करती हुई पर्याप्त ज्वालामयी हो जा। तू और यह यजमान इष्ट और पूर्त्त कर्मों को मिल्कर सम्पादित करें। इस अति उत्कृष्ट, भव्य और अत्युच्च यज्ञशाला में सब विद्वान और यज्ञकर्त्ता जन मिलकर बैठें।
घृत की तीन समिधायें रखने के मंत्र
इस मंत्र से प्रथम समिधा रखें।
ॐ अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्द्धस्व चेद्ध वर्धयचास्मान् प्रजयापशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन
समेधय स्वाहा । इदमग्नेय जातवेदसे – इदं न मम ॥१॥
व्‍याख्‍या- मैं सर्वरक्षक परमेश्वर का स्मरण करता हुआ कामना करता हूँ कि हे सब उत्पन्न पदार्थों के प्रकाशक अग्नि! यह समिधा तेरे जीवन का हेतु है ज्वलित रहने का आधार है।उस समिधा से तू प्रदीप्त हो, सबको प्रकाशित कर और सब को यज्ञीय लाभों से लाभान्वित कर, और हमें संतान से, पशु सम्पित्त से बढ़ा।ब्रह्मतेज ( विद्या, ब्रह्मचर्य एवं अध्यात्मिक तेज से, और अन्नादि धन-ऐश्वयर् तथा भक्षण एवं भोग- सामथ्यर् से समृद्ध कर। मैं त्यागभाव से यह समिधा- हवि प्रदान करना चाहता हूँ | यह आहुति जातवेदस संज्ञक अग्नि के लिए है, यह मेरी नही है ||1||
इन दो मन्त्रों से दूसरी समिधा रखें
ओं समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथम् |
आस्मिन हव्या जुहोतन स्वाहा |
इदमग्नये इदन्न मम ||२||
व्‍याख्‍या- मैं सर्वरक्षक परमेश्वर का स्मरण करते हुए वेद के आदेश का कथन करता हूँ कि हे मनुष्यो! समिधा के द्वारा यज्ञाग्नि की सेवा करो -भक्ति से यज्ञ करो।घृताहुतियों से गतिशील एवं अतिथ के समान प्रथम सत्करणीय यज्ञाग्नि को प्रबुद्ध करो, इसमें हव्यों को भलीभांति अपिर्त करो।मैं त्यागभाव से यह समिधा- हवि प्रदान करना चाहता हूँ। यह आहुति यज्ञाग्नि के लिए है, यह मेरी नहीं है ||२||
सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन अग्नये जातवेदसे स्वाहा।
इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम ||३||
व्‍याख्‍या- मैं सर्वरक्षक परमेश्वर के स्मरणपूर्वक वेद के आदेश का कथन करता हूँ कि हे मनुष्यों! अच्छी प्रकार प्रदीप्त ज्वालायुक्त जातवेदस् संज्ञक अग्नि के लिए वस्तुमात्र में व्याप्त एवं उनकी प्रकाशक अग्नि के लिए उत्कृष्ट घृत की आहुतियाँ दो . मैं त्याग भाव से समिधा की आहुति प्रदान करता हूँ यह आहुति जातवेदस् संज्ञक माध्यमिक अग्नि के लिए है यह मेरी नहीं।।३।। इस मन्त्र से तीसरी समिधा रखें।
तन्त्वा समिदि्भरङि्गरो घृतेन वर्द्धयामसि ।
बृहच्छोचा यविष्ठय स्वाहा।।इदमग्नेऽङिगरसे इदं न मम।।४।।
व्‍याख्‍या - मैं सर्वरक्षक परमेश्वर का स्मरण करते हुए यह कथन करता हूँ कि हे तीव्र प्रज्वलित यज्ञाग्नि! तुझे हम समिधायों से और धृताहुतियों से बढ़ाते हैं।हे पदार्थों को मिलाने और पृथक करने की महान शक्ति से सम्पन्न अग्नि ! तू बहुत अधिक प्रदीप्त हो, मैं त्यागभाव से समिधा की आहुति प्रदान करता हूँ ।यह अंगिरस संज्ञक पृथिवीस्थ अग्नि के लिए है यह मेरी नहीं है।
नीचे लिखे मन्त्र से घृत की पांच आहुति देवें
ओम् अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वद्धर्स्व चेद्ध वधर्य चास्मान् प्रजयापशुभिब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन
समेधय स्वाहा।इदमग्नये जातवेदसे - इदं न मम।।१।।
व्‍याख्‍या- मैं सर्वरक्षक परमेश्वर का स्मरण करता हुआ कामना करता हूँ कि हे सब उत्पन्न पदार्थों के प्रकाशक अग्नि! यह धृत जो जीवन का हेतु है ज्वलित रहने का आधार है।उस धृत से तू प्रदीप्त हो और ज्वालाओं से बढ़ तथा सबको प्रकाशित कर = सब को यज्ञीय लाभों से लाभान्वित कर और हमें संतान से, पशु सम्पित्त से बढ़ा। विद्या, ब्रह्मचर्य एवं आध्यात्मिक तेज से, और अन्नादि धन ऐश्वर्य तथा भक्षण एवं भोग सामर्थ्य से समृद्ध कर। मैं त्यागभाव से यह धृत प्रदान करता हूँ ।यह आहुति जातवेदस संज्ञक अग्नि के लिए है, यह मेरी नहीं है| ||१||

जल - प्रसेचन के मन्त्र

इस मन्त्र से पूर्व में
ओम् अदितेऽनुमन्यस्व।।
व्‍याख्‍या- हे सर्वरक्षक अखण्ड परमेश्वर! मेरे इस यज्ञकर्म का अनुमोदन कर अर्थात मेरा यह यज्ञानुष्ठान अखिण्डत रूप से सम्पन्न होता रहे।अथवा, पूर्व दिशा में, जलसिञ्चन के सदृश, मैं यज्ञीय पवित्र भावनाओं का प्रचार प्रसार निबार्ध रूप से कर सकूँ, इस कार्य में मेरी सहायता कीजिये।
इससे पश्चिम में
ओम् अनुमतेऽनुमन्यस्व।।
व्‍याख्‍या- हे सर्वरक्षक यज्ञीय एवं ईश्वरीय संस्कारों के अनुकूल बुद्धि बनाने में समर्थ परमात्मन! मेरे इस यज्ञकर्म का अनुकूलता से अनुमोदन कर अर्थात यह यज्ञनुष्ठान आप की कृपा से सम्पन्न होता रहे।अथवा, पश्चिम दिशा में जल सिञ्चन के सदृश मैं यज्ञीय पवित्र भावनाओं का प्रचार-प्रसार आपकी कृपा से कर सकूं, इस कार्य में मेरी सहायता कीजिये।
इससे उत्तर में
ओम् सरस्वत्यनुमन्यस्व।।
व्‍याख्‍या-हे सर्वरक्षक प्रशस्त ज्ञानस्वरूप एवं ज्ञानदाता परमेश्वर! मेरे इस यज्ञकर्म का अनुमोदन कर अर्थात आप द्वारा प्रदत्त उत्तम बुद्वि से मेरा यह यज्ञनुष्ठान सम्यक विधि से सम्पन्न होता रहे।अथवा, उत्तर दिशा में जलसिञ्चन के सदृश मैं यज्ञीय ज्ञान का प्रचार-प्रसार आपकी कृपा से करता रहूँ, इस कार्य में मेरी सहायता कीजिये।
और - इस मन्त्र से वेदी के चारों और जल छिड़कावें।
ओं देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपतिं भगाय।दिव्यो
गन्धर्वः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु।।
व्‍याख्‍या-- चारों दिशायों में जल सिञ्चन के सदृश मैं यज्ञीय पवित्र भावनाओं का प्रचार-प्रसार कर सकूँ, इस कार्य के लिए मुझे उत्तम ज्ञान, पवित्र आचरण और मधुर-प्रशस्त वाणी में समर्थ बनाइये।

चार घी की आहुतियाँ

इस मन्त्र से वेदी के उत्तर भाग में जलती हुई समिधा पर आहुति देवें।

ओम् अग्नये स्वाहा | इदमग्नये - इदं न मम।।

इस मन्त्र से वेदी के दक्षिण भाग में जलती हुई समिधा पर आहुति दें।
ओम् सोमाय स्वाहा | इदं सोमाय - इदं न मम।।

इन  मन्त्रों से यज्ञ कुण्ड के मध्य में दो आहुति देवें।
ओम् प्रजापतये स्वाहा | इदं प्रजापतये - इदं न मम।।

ओम् इन्द्राय स्वाहा | इदं इन्द्राय - इदं न मम।।


इन मन्त्रों से घृत के साथ साथ सामग्री आदि अन्य होम द्रव्यों की भी आहुतियां दें।
ओम् ज्योतिर्ज्योति: सूर्य: स्वाहा।।१।।
ओम् सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्च: स्वाहा।।२।।
ओम् ज्योतिः सूर्य: सुर्योज्योति स्वाहा।।३।।
ओम् सजूर्देवेन सवित्रा सजूरूषसेन्द्रव्यता जुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा।।४।।


 गायत्री मन्त्र
अब तीन बार गायत्री मन्त्र से आहुति दे
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि |
धियो यो नः प्रचोदयात् स्वाहा।।

पूर्णाहुति
इस मन्त्र से तीन बार घी से पूर्णाहुति करें
ओम् सर्वं वै पूर्णं स्वाहा।।
व्‍याख्‍या- हे सर्वरक्षक, परमेश्वर ! आप की कृपा से निश्चयपूर्वक मेरा आज का यह समग्र यज्ञानुष्ठान पूरा हो गया है मैं यह पूर्णाहुति प्रदान करता हूँ।
पूर्णाहुति मन्त्र को तीन बार उच्चारण करना इन भावनाओं का द्योतक है कि शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक तथा पृथिवी, अन्तिरक्ष और द्युलोक के उपकार की भावना से, एवं आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक सुखों की प्राप्ति हेतु किया गया यह यज्ञानुष्ठान पूर्ण होने के बाद सफल सिद्ध हो।इसका उद्देश्य पूर्ण हो।
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Tuesday, September 27, 2016

वेद सार-72

सा मा सत्योक्ति : परिं पातु विश्वतो द्यावा च यत्र ततनन्न हानि च ।
विश्वमन्यन्निविंशते यदेजति विश्वाहापो विश्वाहोदेति सूर्य: ।।
                                                                                      ऋग्वेद:-7/8/12/2




भावार्थ :- 
 सा - वह
मा - हमको/ हमारी
सत्योक्ति- सत्य आज्ञा
परिपातु - सर्वथा पालन और सदा पृथक रखें
विश्वत: - सब संसार से और सब दुष्ट कामों से
द्यावा - दिव्य सुख से
च - और
यत्र- जिस दिव्य दृष्टि में
ततनन् - अपने ही विस्तारे हंै
अहानि - सूर्यादिकों को दिवस आदि के होने के निमित्त
विश्वम - सब जगत
अत्यन्त - आपसे अन्य
निविश्ते - आपके सामर्थ से प्रलय में प्रवेश करता है
यद् - जिस समय यह जगत
एजति - चलित होके उत्पन्न होता है
विश्वाहप : -विश्व के हन्ताओं से रक्षा करने वाला
विश्वाहा-जो-जो विश्व का हन्ता
उदेति - आप सब जगत में उदित/
प्रकाशमान हो रहे हो
सूर्य - सूर्यवत् हमारे हदय में प्रकाशित होओ ।

व्याख्या :- हे सर्वभिरक्षकेश्वर। आप की सत्य आज्ञा जिसका हमने अनुष्ठान किया वह हमको सब संसार से सर्वथा पालन और सब दुष्ट कामों से सदा पृथक रखे ताकि कभी हमको अधर्म करने की इच्छा भी न हो और दिव्य सुख से सदा युक्त करके यथावत् हमारी रक्षा करे।
जिस दिव्य सृष्टि में सूर्यादिकों को दिवस आदि होने के निमित्त आपने ही विस्तारे हंै वहां भी हमारा सब उपद्रवों से रक्षण करो।
आप से अन्य सब जगत जिस समय आपके सामथ्र्य से प्रवेश करता है उस समय में भी आप हमारी रक्षा करें। जिस समय यह जगत आप के सामथ्र्य से चलित होके उत्पन्न होता है उस समय भी सब पीडाओं से आप हमारी रक्षा करें।
जो - जो विश्व का हन्ता उसको आप नष्ट कर दो क्योंकि आप के सामथ्र्य में सब जगत की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय होता है। आपके सामने कोई राक्षस क्या कर सकता है। क्योंकि आप सब जगत में उदित हो रहे हो। परन्तु सूरर्यवत हमारे हदय में कृपा करके प्रकाशित होओ, जिससे हमारी अविधान्धकारता सब नष्ट हो।

Saturday, September 24, 2016

वेद सार-71


मृळ नो रूद्रोत नो मयस्कृधि  क्षयद्वीराय नमसा बिधेम ते ।
यच्छं च योश्च मनुरायेजे पिता तदश्याम तव रूद्र प्रणीतिषु ।

                                                              ऋग्वेद:- 1/8/5/2



भावार्थ :-
 मृळ-सुखीकर
न: -हमको
रूद्र - हे दुष्टों को रूलाने वाले रूद्रेश्वर
उत - तथा
मयस्कृधि- अत्यन्त सुख का संपादन कर
क्षयद्वीराय- शत्रुओं के वीरों का क्षय करने वाले
नमसा- अत्यन्त नमस्कार आदि से
विधेम- परिचर्या करें
ते - आपकी
यत्- हमारी समस्त प्रजा को
शम् - सुखी कर
यो:- प्रजा के
च - रोगों का भी
मनु:- मान्यकारक
आयेजे - स्वप्रजा को संगत और अनेकविध लाडन करता है
तद - वीरों के चक्रवर्ती राज्य को
अश्याम - प्राप्त हों
तव - आपकी
रूद्र- हे रूद्र भगवन
प्रणीतिषु - उत्तम न्याययुक्त नीतियों मे

व्याख्या :- हे दुष्टों को रूलानेहारे रूद्रेश्वर हमको सुखी कर। शत्रुओं के वीरों का क्षय करने वाले अत्यन्त नमस्करादि से आपकी परिचर्या करने वाले हमलोगों का रक्षण यथावत कर ।
हे रूद्र। आप हमारे पिता हो,हमारी समस्त प्रजा को सुखी कर। प्रजा के रोगों का भी नाश कर । जैसे मनु स्वप्रजा को संगत और अनेक विधि से लाडन करता है वैसे आप हमारा पालन करो । हे रूद्र आपकी आज्ञा का प्रणय अर्थात उत्तम न्याययुक्त नीतियों में प्रवृत होके वीरो के चक्रवर्ती राज्य को आपके अनुग्रह से प्राप्त हो।

Friday, September 23, 2016

वेद सार-70

मा नो वधीरिन्द्र मा परा दा मा न:प्रिया भोजनानि प्रमोषी:।
आण्डा मा नो मघवञ्छक्र निर्भेन्मा न:  पात्रा भेत सहजानुषाणि ।।

                                                                                      ऋग्वेद:-1/7/19/8





भावार्थ :-
मा - मत
न:- हमारा
वधी :- बध कर
इन्द्र - हे परमैश्वरर्ययुक्तेश्वर
परा - अलग
दा :- हो
प्रिया - प्रिय
भोजनानि- भोगो को
प्रमोषी :- चोर और चोरवावो
आण्डा - गर्भो का
मघवन - हे सर्वशक्तिमान
शक्र - समर्थ और पुत्रों का
निर्भेत - विदारण कर
पात्रा - भोजनार्थ सवर्णनादि पात्रों को
भेत-अलग कर / नष्ट करो सहजानुषाणि - सहज अनुषक्त स्वाभाव से अनुकूल मित्र है, उनको ।

व्याख्या :- हे इन्द्र परमैश्वर्ययुक्तेश्वर । हमको आप अपने से अलग मत गिरावें अर्थात हमारा वध मत कर। हमसे अलग आप भी मत हो। हमारे प्रिय भोगों को मत चोर चोरवावें।
हमारे गर्भों का विदारण मत कर । हे मघवन हमारे समर्थ पुत्रों का विदारण मत कर । हमारे भोजनार्थ सुवर्णादि पात्रों को हमसे अलग मत कर । जो जो हमारे सहज अनुषक्त स्वाभाव से अनुकूल मित्र हैं उनको आप नष्ट मत करो अर्थात कृपा करके पूर्वोक्त सब पदार्थो की यथावत रक्षा करो। 

Thursday, September 22, 2016

वेद सार-69

विष्णो : कर्मणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे।
 इन्द्रस्य युज्य : सखा ।।

                                                              ऋग्वेद:-1/2/7/19




भावार्थ :- विष्णो:- व्यापक ईश्वर के ।
कर्माणि - जगत की उत्पति, स्थिति, प्रलय आदि कर्मो को
पश्यत - तुम देखो
यत :- जिससे
व्रतानि - ब्रह्मर्यादिव्रत तथा सत्यभाषणादिव्रत और ईश्वर के नियमों के अनुष्ठान करने को
पस्पशे - समर्थ हुए हैं
इन्द्रस्य - इन्द्रियों के साथ वर्तमान कर्मों के कर्ता,भोक्ता जीव का
युज्य- योग्य
सखा - मित्र।
व्याख्या :- हे जीवो , विष्णु के किये दिव्य जगत की उत्पति स्थिति , प्रलय आदि कर्मों को तुम देखो। जिससे हमलोग ब्रह्मचर्यादि व्रत तथा सत्यभाषणादि व्रत और ईश्वर के नियमों का अनुष्ठान करने को जीव सुशरीरधारी हो के समर्थ हुए हैं। यह काम उसी के सामथ्र्य से है क्योंकि इन्द्रियों के साथ वर्तमान कर्मों का कर्ता, भोक्ता जो जीव इस का वहीं एक मित्र है अन्य कोई नहीं। क्योंकि ईश्वर जीव का अन्तर्यामी है। उससे परे जीव का हितकारी कोई और नहीं हो सकता, इसलिए परमात्मा से सदा  मित्रता रखनी चाहिए।



Tuesday, September 20, 2016

वेद सार-68


वयं जयेम त्वया युजा वृतमस्माकमशमुदवा भरे भरे ।
 अस्मभ्यमिन्द्र वरिव: सुगं कृधि प्र शत्रुणां मघबन्बृष्ण्या रूज ।।
                                                                          ऋग्‍वेद:- 1/7/14/4





भावार्थ :-
वयम् - हमलोग
जयेम- दुष्ट जन को जीतें
त्वया - आपके तथा वर्तमान
युजा - आपकी सहायता से
आबृतम - हमारे बल से घेरा हुआ
अस्माकम््-हमारे
अंशम् - अंश(बल)
उदवा - उत्तम रीति से रक्षण करो
भरे भरे- युद्ध युद्ध में
अस्मभ्यम्- हमारे लिए
इन्द्र मघबन - हे महाघनेश्वर
वरिव: - चकवर्ती राज्य और साम्राज्य धन को
सुगम - सुख से प्राप्त
कृधि - कर
शत्रुनाम् - हमारे शत्रुओं के
मघबन - महाघनेश्वर
बृष्ण्या - वीर्य पराक्रमादि को
रुज-प्रभग्न
रुग्न करके नष्ट कर दे

व्याख्या :- हे इन्द्र आपके साथ वर्तमान में आपकी सहायता से हमलोग दुष्ट शत्रुजन को जीतें। वह शत्रु हमारे बल से घिरा हुआ हो।
हे महाराजाधिराजेश्वर, युद्ध - युद्ध में हमारे बल का उत्तम रीति से कृपा करके रक्षण करो, जिससे किसी युद्ध में क्षीण होके हम पराजय को न प्राप्त हों। क्योंकि जिनको आप की सहायता है उसका सर्वत्र विजय ही होता है।
हे इन्द्र हमारे शत्रुओं के पराक्रम को नष्ट कर दे। हमारे लिए चक्रवर्ती राज्य और साम्राज्य धन को सुख से प्राप्त कर।