Tuesday, October 25, 2016

भगवान धनवन्तरी की पूजा का पर्व धनतेरस

धन तेरस को धन त्रयोदशी भी कहते हैं। जिस प्रकार देवीलक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थीं, उसी प्रकार भगवान धनवन्तरी भी अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए हैं। देवी लक्ष्मी हालांकि धन देवी हैं, परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए हमको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए। यही कारण है कि दीपावली के दो दिन पहले धनतेरस का पर्व धन वैभव और आरोग्य प्राप्ति के दृष्टिकोण से अति उत्तम पर्व माना जाता है। यह भी मान्यता है कि इस दिन बर्तनो की खरीदी सम्पन्नता को और अधिक पुष्टता प्रदान करती है।
गरूड पुराण के अनुसार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही भगवान धन्वन्तरी का जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को भगवान धन्वन्तरी के नाम पर धनतेरस कहते हैं । धन्वन्तरी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। चूंकि कलश लेकर भगवान धन्वन्तरी प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है।

 भगवान विष्णु के अवतार धनवन्तरी को आयुर्वेद विशेषज्ञ होने से देवो के वैद्य के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।  ये चिकित्सा के देवता माने जाते हैं। इसलिए चिकित्सकों के लिए धनतेरस का दिन बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। धनतेरस के दिन दीप जला कर भगवान धन्वन्तरि की पूजा करें और उनसे स्वास्थय एवम सेहतमंद बनाये रखने के लिए प्रार्थना करें। धनतेरस के दिन चांदी खरीदने की भी प्रथा है। इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है।
एक मान्यता के अनुसार धनतेरस के दिन मृत्यु के भय और अकाल मृत्यु को परिवार से दूर रखने यम अथवा यमराज की पूजा का प्रावधान है। इस दिन प्रत्येक हिन्दू धर्मावलम्बी अपने घर के द्वार पर तेरह दीपक जलाकर भगवान धनवंतरी से यही प्रार्थना करता है कि उसका परिवार सभी व्याधियों से मुक्त रहे और धन-धान्य से परिपूर्ण हो । धनतेरस के दिन घर के दक्षिण दिशा में दीप जलाने की शास्त्रोक्त परम्परा भी बतायी जाती है।
औषधियो के प्रभाव और चिकित्सको के ज्ञान वृद्धि के उद्देश्य से भी धनतेरस पर्व उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। एक ऐसे कथानक में जानकारी भी मिलती है, कि यमगणों के विचारों को जानने के लिए यमराज ने एक बार उनसे पूछा कि प्राणियों के प्राण हरते समय तुम्हें दु:ख होता है या नहीं । यम के भय से यमगणों ने कुछ भी कहने से परहेज किया। किन्तु यम द्वारा भय समाप्त करने पर उन्होंने कहा कि अनेक बार अकाल मृत्यु पर उनका हृदय दुखित हो उठता है। तब यमराज ने रहस्य प्रकट करते हुए कहा कि धनतेरस के दिन जो प्राणी मेरी पूजा कर घर के दक्षिण दिशा में दीपो की रोशनी करेगा उसे अकाल मृत्यु से सर्वथा भय मुक्ति प्राप्त होगी ।
 आयुर्वेद के संबंध में सृष्टि रचयिता बह्मा जी ने स्वयं एक लाख श्लोक सहित आयुर्वेद महत्व का प्रकाशन किया। जिसे इन्द्र के मुख से स्वयं धनवंतरी जी ने सुना। उसी श्लोक में से एक इस प्रकार है -
विद्याताथर्य सर्वस्वमायुर्वेद प्रकाशयन
स्वनाम्ना संहितां चके लक्ष श्लोकमयीमृजुम ॥


भगवान धनवन्तरी की साधना के लिए निम्न मंत्र का जाप उत्तम है।
ऊँ धन्वतरये नम:।

इस मंत्र के अलावा भी भगवान धनवन्तरी को प्रसन्न करने वंदना इस प्रकार की जा सकती है -

ऊँ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धनवन्तराये
अमृत कलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय सर्व रोग निवारणाय ।
त्रिलोकनाथाय - त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णु स्वरूप,
श्री धनवन्तरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नम:॥

Saturday, October 22, 2016

वेद सार- 77

आवदंस्त्वं शकुने भद्रमा वद तूष्णीमासीन:  सुमति चिकिद्धि न:। 
यदुत्पतन् वदसि कर्करिर्यथा बृहद्वदेम विदर्थे सुवीरा: ।।
                                                                              ऋग्वेद:- 2/8/12/3


भावार्थ :-
 आवदन - निरंतर उपदेश करते हुए
 त्वम्- आप
शकुने- हे जगदीश्वर
भद्रम- मोक्ष सुख का
आवद- निरंतर उपदेश कीजिए
तूष्णीम् - मौन से ही
आसीन:- हमारे हदय मेंं सदा स्थिर होकर
सुमतिम् - सर्वोतम ज्ञान
चिकिद्धि - अपने रहने के लिए घर ही बनाओ
न: -हमको
यद - जो
उत्पतन् - उत्तम व्यवहार में पहुंचाए हुए
वदसि - उपदेश है
कर्करि: - कर्तव्य,कर्म,धर्म को ही पुरुषार्थ से करो
यथा- जिस प्रकार
वृहद् - सबसे बड़े परब्रह्म की  वदेम - स्तुति , उपदेश , प्रार्थना , उपासना, आदि सर्वदा कहें , सुनें विदर्थ- विज्ञानादि यज्ञों में
 सुवीरा:- अत्यंत शूरवीर होके।

व्याख्या:- हे जगदीश्वर । आप समस्त कल्याण का भी कल्याण कीजिए। हे अन्तर्यामिन हमारे हदय में सदा स्थिर हो मौन से ही सर्वोतम ज्ञान दो। कृपा से हमको अपने रहने के लिए घर ही बनाओ और आपकी परमविद्या को हम प्राप्त हों।
उत्तम व्यवहार में पहुंचाते हुए आप का जिस प्रकार से कर्तव्य कर्म, धर्म को ही अत्यंत पुरुषार्थ से करो, अकत्र्तव्य दुष्ट काम मत करो, ऐसा उपदेश है कि यथायोग्य उद्धम को कभी कोई मत छोड़ो। वैसे विज्ञानादि यज्ञ वा घर्मयुक्त युद्धों में अत्यंत शूरवीर हो के आप जो परब्रह्म उन आप की स्तुति, आपका उपदेश, आप की प्रार्थना और उपासना तथा आपका यह बड़ा अखंड साम्राज्य और स मनुष्यों का हित सर्वदा कहें, सुनें और आप के अनुग्रह से परमानांद को भोगे।

Friday, October 21, 2016

वेद सार -76


उदगातेव शकुने साम गायसि ब्रह्मपुत्र इव सवनेषु शंससि ।
वृषेव वाजी शिशुमतीरपीत्या सर्वतो न: शकुने भद्रमा वद विश्वतो न: शकुने पुण्यमा वद ।।

ऋग्वेद:-2/8/12/2

भावार्थ :-
 उदगाता - यज्ञ मे सामगान करने वाला महापंडित
इव- जैसे
शकुने- हे सर्वशक्तिमन्नीश्वर
साम- सामगान को
गायसि - गाते ही हो
ब्रह्मपुत्र - वेदों के वेत्ता
सवनेषु - विज्ञान सब पदार्थो की शंससि - प्रशंसा करता है
वृषा - उत्तम गुण और उत्तम पदार्थो की वृष्टि करने वाले
वाजी - सर्वशक्ति का सेवन और अन्नदि पदार्थो के देने वाले
शिशुमती: - उत्तम शिशु
अपीत्य - प्राप्त हो के
सर्वत: - सब ठिकानों से
न: - हमारे लिए
भद्रम- कल्याण को
आवद - अच्छे प्रकार कहो
पुण्यम - धर्मात्मा के कर्म करने को

व्याख्या:- हे सर्वशक्तिमन्नीश्वर । आप साम गान को गाते ही हो, वैसे ही हमारे हदय में सब विद्या का प्रकाशित गान करो। जैसे यज्ञ में महापंडित सामगान करता है वैसे आप भी हमलोगोंं के बीच में सामादि विद्या का प्रकाश कीजिए।
आप कृपा से पदार्थ विद्याओंं की प्रशंसा करते हो वैसे हमको भी यथावत प्रशंसित करो। जैसे वेदों का वेत्ता विज्ञान से सब पदार्थो की प्रशंसा करता है वैसे आप भी हम पर कृपा कीजिए।
 आप सर्वशक्ति का सेवन करने और अन्नदि पदार्थांे के देनेवाले तथा महाबलवान और बेगवान होने से वाजी हो, जैसे कि वृषभ के समान आप उत्तम गुण और उत्तम पदार्थो की वृष्टि करने वाले हो वैसे हम पर उनकी वृष्टि करो।
हमलोग आपकी कृपा से उत्तम शिशु को प्राप्त होके आप को ही भेजें।
हे शकुने। सब ठिकानों से हमारे लिए कल्याण को अच्छे प्रकार कहो। हे सबको सुख देने वाले ईश्वर । सब जगत के लिये धर्मात्मा के कर्म करने को उपदेश कर जिससे कोई मनुष्य अधर्म करने की इच्छा भी न करे और सब ठिकानों में सत्य धर्म की प्रवृति हो ।

Monday, October 10, 2016

वेद सार -75

मा नस्तोके तनये मा आयौ मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषा:।
वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधीर्हविष्मन्त: सदभित्वा हवामहे।।

ऋग्वेद:-1/8/6/8

भावार्थ:-
मा-मत
न: - हमारे
तोके-कनिष्ठ पुत्र में
तनये-मध्यम और ज्येष्ठ पुत्रों में
आर्यो- उमर में
गोषु- गाय आदि पशुओं
रीरिष: -रोगयुक्त होके प्रवृत हों
वीरान-सेना के शूरों में
रुद्र-हे भगवान रुद्र
भामित: -क्रोधित
वधी: -नष्ट करो
हविष्मन्त: -यज्ञ करने वाले
सदम्-सदा
इत-एव
त्वा-आपको
हवामहे-आह्वान करते हैं।

व्याख्या:-हे रुद्र आप हमारे कनिष्ठ,मध्यम और ज्येष्ठ पुत्र,उमर,गाय आदि पशुओं,हमारी सेना के शूरों में,यज्ञ के करने वाले पर कभी क्रोधित और रोषयुक्त होकर प्रवृत मत हो। हमलोग आप को सदैव आह्वान करते हैं।
हे भगवान रुद्र आपसे यही प्रार्थना है कि हमारी और हमारे पुत्रों,धनैश्वर्यादि की रक्षा करो। 

Saturday, October 8, 2016

वेद सार-74

मा नो महान्तमुत मा नो अर्भक मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्।
मा नो वधी: पितरं मोत मातरं मा न: प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिष:।।

ऋग्वेद:-1/8/6/7

भावार्थ:-
मा- मत
न: - हमारे
महान्तम-ज्ञानवृद्ध ,वयोवृद्ध पिता को
उत-और
अर्भकम्-छोटे बालक को
उक्षन्तम्-वीर्य सेचन समर्थ जवान को
उक्षितम्-जो गर्भ में वीर्य सेचन किया है उसको
वधी: - नष्ट करो
पितरम्- पिता को
मातरम्- माता को
प्रिया: - प्रिय
तन्व: - शरीर को
रीरिष: -हिंसा मत करो

व्याख्या:-हे दुष्ट विनाशकेश्वर आप हम पर कृपा करो। हमारे ज्ञानवृद्ध वयोवृद्ध पिता को आप नष्ट मत करो तथा छोटे बालक और जवान तथा जो गर्भ में वीर्य को सेचन किया है उसको विनष्ट मत करो। हमारे पिता,माता और प्रिय शरीर का हिंसन मत करो।


Friday, October 7, 2016

कलश स्थापन


किसी भी पूजन या शुभ कार्य में मंगल कामना के निहितार्थ कलश की बड़ी महिमा बताई गई है। कलश पूजन सुख व समृद्धि को बढ़ाता है। कलश स्थापन में सभी प्रमुख देवी देवताओं का आह्वान किया जाता है। कलश स्थापन की पूरी अनुष्ठानिक प्रक्रिया काफी महत्वपूर्ण और मायने रखती है। तदुपरांत कलश में डाली जाने वाली सामग्री भी इसे अधिक पवित्र बना देती हैं।

कलश में डाली जाने वाली वस्तुएं और उनसे फायदे:-

कलश:-देव पूजन में लिया जाने वाला कलश तांबे या पीतल धातु से बना हुआ होना शुभ कहा गया है। मिट्टी का कलश भी श्रेष्ठ कहा गया है।

पंच पल्लव:-पीपल, आम, गूलर, जामुन, बड़ के पत्ते पांचों पंचपल्लव कहे जाते हैं। कलश के मुख को पंचपल्लव से सजाया जाता है। जिसके पीछे कारण है ये पत्ते वंश को बढ़ाते हैं।

पंचरत्न:-सोना, चांदी, पन्ना, मूंगा और मोती ये पंचरत्न कहे गए हैं। वेदों में कहा गया है पंचपल्लवों से कलश सुशोभित होता है और पंचरत्नों से श्रीमंत बनता है।

जल:-जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। जल शुद्ध तत्व है। जिसे देव पूजन कार्य में शामिल किए जाने से देवता आकर्षित होकर पूजन स्थल की ओर चले आते हैं। जल से भरे कलश पर वरुण देव आकर विराजमान होते हैं।

नारियल:-नारियल की शिखाओं में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार पाया जाता है। नारियल की शिखाओं में मौजूद ऊर्जा तरंगों के माध्यम से कलश के जल में पहुंचती है। यह तरंगें काफी सूक्ष्म होती हैं। नारियल को कलश पर स्थापित करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि नारियल का मुख यजमान की ओर हो।

सोना:-ऐसी मान्यता है कि सोना अपने आस-पास के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है। सोने को शुद्ध कहा जाता है। यही वजह है कि इसे भक्तों को भगवान से जोडऩे का माध्यम भी माना जाता है।

तांबे का पैसा:-तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है। कलश में उठती हुई तरंगे वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं। कलश में पैसा डालना त्याग का प्रतीक भी माना जाता है। यदि आप कलश में तांबे के पैसे डालते हैं, तो इसका मतलब है कि आपमें सात्विक गुणों का समावेश हो रहा है।

सात नदियों का पानी:-गंगा, गोदावरी, यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरी और नर्मदा नदी का पानी पूजा के कलश में डाला जाता है। अगर सात नदियों के जल की व्यवस्था नहीं हो तो केवल गंगा का जल का ही उपयोग करें। यदि वह भी उपलब्ध नहीं हो तो सरलता से जो भी जल प्राप्त हो उसे ही सात नदियों का जल मानकर कलश में भरें।

सुपारी:-यदि हम जल में सुपारी डालते हैं, तो इससे उत्पन्न तरंगें हमारे रजोगुण को समाप्त कर देती हैं और हमारे भीतर देवता के अच्छे गुणों को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है।

पान:-पान की बेल को नागबेल भी कहते हैं। नागबेल को भू लोक और ब्रह्मलोक को जोडऩे वाली कड़ी माना जाता है। इसमें भूमि तरंगों को आकृष्ट करने की क्षमता होती है। साथ ही इसे सात्विक भी कहा गया है।

दूर्वा:-दूर्वा हरियाली का प्रतीक है। कलश में दूर्वा को डाला जाना जीवन में हरियाली यानी खुशियां बढ़ाता है।

कलश पूजन व स्थापना की विधि
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सबसे पहले पूूजन किए जाने वाले स्थान को साफ कर लें। वहां एक लगड़ी का पाटा रखें जिस पर हल्दी और कुमकुम से कोई शुभ मांगलिक चिह्न बनाएं। इस पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं। अब सबसे पहले श्रीगणेश की मूर्ति स्थापित करें। देव स्थापना करें। अब कलश स्थापित करें। दीपक स्थापित करें। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कलश देव मूर्ति के दाहिनी ओर स्थापित किया गया हो। कलश की स्थापना चावल या अन्न की ढेरी पर करें।

कलश पूजन के समय इस मंत्र का जप किया जाना चाहिए:-
कलशस्य मुखे विष्णु कंठे रुद्र समाश्रिता: मूलेतस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मात्र गणा स्मृता:।
कुक्षौतु सागरा सर्वे सप्तद्विपा वसुंधरा,
ऋग्वेदो यजुर्वेदो सामगानां अथर्वणा:
अङेश्च सहितासर्वे कलशन्तु समाश्रिता:।

अर्थात कलश के मुख में संसार को चलाने वाले श्री विष्णु, कलश के कंठ यानी गले में संसार को उत्पन्न करने वाले श्री शिव और कलश के मूल यानी की जड़ में संसार की रचना करने वाले श्री ब्रह्मा ये तीनों शक्ति इस ब्रह्मांड रूपी कलश में उपस्थित हैं। कलश के बीच वाले भाग में पूजनीय मातृकाएं उपस्थित हैं। समुद्र, सातों द्वीप, वसुंधरा यानी धरती, ब्रह्माण्ड के संविधान कहे जाने वाले चारों वेद इस कलश में स्थान लिए हैं। इन सभी को मेरा नमस्कार हैं।

 इसके बाद उक्त मंत्रों से वरुण देव को नमस्कार करें:-
ऊँ अपां पतये वरुणाय नम:।
इन मंत्रों के साथ कलश पूजन करें। कलश पर गंध, पुष्प्प और चावल अर्पित करें।

Thursday, October 6, 2016

संक्षिप्‍त पूजा विधि

सनातन धर्म की परंपरा में पूजा विधि
का बहुत महत्व है।  हर इंसान जिंदगी की भाग दौड़ से पस्त होकर या फिर जिंदगी में कुछ विशेष अभिलाषा को लेकर कुछ ही क्षण के लिए सही पूजा-पाठ में जरूर व्यतीत करता है। वैदिक अवलोकन से यह बात साफ है कि मनुष्य की तीन क्षुधाएं होती हैं-
1.दैहिक 2.मानसिक 3.आर्थिक
इसके लिए आवश्यक है कि हम प्रात: काल उठते ही सर्वप्रथम दोनों हथेली को रगड़ते हुए बोलें-कराग्रे वसति लक्ष्मी,कर मध्ये च सरस्वती,कर मूले स्थितो ब्रह्मा,प्रात: हस्त दर्शनम्। फिर भूमि को प्रणाम करें।
भूमि पूजन मंत्र--ऊँ पृथ्वि। त्वया धृता लोका देवि। त्वं विष्णुनाधृता। त्वं च धारय मां देवि। पवित्रां कुरु चारूनम्।
वहीं जब पूजा करनी हो तो स्नान के पश्चात शांत चित्त होकर बैठ जाएं।  मन को एकाग्र करने के लिए 5 बार गायत्री मन्त्र का उच्चारण करें। फिर जल से आचमन करें। उसके उपरांत जल, अक्षत (चावल) और पुष्प लेकर संकल्प लें।  किसी भी पूजा में पृथ्वी, गणेश, गौरी, नवग्रह, वरुण, स्थान देव, कुलदेव और देवी तथा पितृ देव का आह्वाहन और ध्यान अवश्य करें। फिर प्रतीक स्वरूप सभी आह्वाहित देवी /देवताओं को स्नान हेतु जल, दूध, शहद, दही इत्यादि अर्पित करें। फिर वस्त्र,तिलक, उसके उपरांत फूल-माला, फिर नैवेद्य, पान-सुपारी तथा अंत में धूप और दीप दिखाएं।
  सामान्य पूजा करने के बाद यथा संभव सभी देवी-देवताओं से सम्बंधित मन्त्रों तथा स्तुतियों का जप और पाठ करें। फिर प्रधान देवी /देवता के लिए ऊपर लिखे विधि से ही पूजन करें। प्रधान देवी /देवता से सम्बंधित कथा, पाठ या मन्त्र जप करें।   तदोपरांत हवन करें। हवन के अंत में हवन में दी गई आहुति के कुल मंत्रों का दशांश तर्पण व उसका दशांश मार्जन करें। 
अंत में आरती करके, प्रदक्षिणा, क्षमा प्रार्थना तथा उन्हें पुन: अपने स्थान पर वापस जाने और जब भी समय हो उन्हें पुन: आने का आग्रह करें।

पूजा के दौरान ध्यान देने योग्य कुछ महत्वपूर्ण बातें:-
बैठने का आसन कुशा या ऊन का होना चाहिए। कभी भी भूमि पर बैठकर पूजा नहीं करनी चाहिए।
 शिव की पूजा में कभी भी तुलसी ना प्रयोग करें।
 कलश सदैव मुख्य देवी/देवता के सम्मुख स्थापित करें।
 प्रधान दीपक को मुख्य देवी /देवता के दाहिनी ओर स्थापित करें तथा उसे  पूजा के दौरान उठायें नहीं। आरती दिखाने के लिए दूसरे दीपक का प्रयोग करें और देवी /देवताओं को दीप दिखाने के लिए प्रधान दीपक पर अक्षत (चावल) छोड़ दें।
  धूप या अगरबत्ती सदैव प्रधान देवी /देवता के बायीं ओर रखें।
  पूजा के दौरान चित्त में कोई भी गलत धारणा लाने से बचें।
   पूजा में प्रयोग होने वाली वस्तुएं शुद्ध और अच्छी हों इसका ध्यान रखें।
    दान सदैव अपने सामर्थ्‍य के अनुसार तथा श्रद्धा पूर्वक करें। हमेशा यह ध्यान दें की जो भी वस्तु आप दान में दे रहे हैं वह उपयोग करने योग्य हो।
 दान सदैव योग्य व्यक्तियों को तथा जरुरत मंद लोगों को ही अपने हाथों से देंं।