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Thursday, June 9, 2016

त्तंत्र मंत्र यंत्र-11

विद्या प्रप्ति के मंत्र और यंत्रगणेश भगवान एवं विद्या दात्री माँ सरस्वती का एक चित्र लें। पूजन सामग्री सम्मुख रखें (गाय के घी का दीपक, धूप, कपूर, पीले चावल, सफेद या पीला मिष्ठान्न, गंगा जल, भोज पत्र, गोरोचन, कुंकुम, केसर, लाल चंदन, अनार या तुलसी की कलम इत्यादि)। सर्वप्रथम गुरु का ध्यान करें। तत्पश्चात गोरोचन, केसर, कुंकुम और लाल चंदन को गंगा जल में घिसकर स्याही बना लें और भोज पत्र पर निम्न मंत्र लिखकर, माँ सरस्वती के चित्र के साथ रखकर एक माला रोज मंत्र का जाप करें। 
गणेश ध्यान : ॐ वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभः। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा। 
गणेश मंत्र : ॐ वक्रतुंडाय हूं॥ 

सरस्वती गायत्री मंत्र : ॐ वागदैव्यै च विद्महे कामराजाय धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्‌। प्रथम दिन 5 माला का जाप करने से साक्षात माँ सरस्वती प्रसन्न हो जाती हैं तथा साधक को ज्ञान-विद्या का लाभ प्राप्त होना शुरू हो जाता है। नित्य कर्म करने पर साधक ज्ञान-विद्या प्राप्त करने के क्षेत्र में निरंतर बढ़ता जाता है। विधि : इस यंत्र को शुभ मुहूर्त में, चाँदी या कांस्य की थाली में, केसर की स्याही से, अनार की कलम से लिखकर, सविधि पूजन करके माता सरस्वतीजी की आरती करें। यात्रांकित कांस्य थाली में भोजन परोसकर श्री सरस्वत्यै स्वाहा, भूपतये स्वाहा, भुवनपतये स्वाहा, भूतात्मपतये स्वाहा चार ग्रास अर्पण करके स्वयं भोजन करें। याद रहे, यंत्र भोजन परोसने से पहले धोना नहीं चाहिए।इसी प्रकार 14 दिनों तक नित्य करने से यंत्र प्रयोग मस्तिष्क में स्नायु तंत्र को सक्रिय (चैतन्य) करता है और मनन करने की शक्ति बढ़ जाती है। धैर्य, मनोबल, आस्थाकी वृद्धि होती है और मस्तिष्क काम करने के लिए सक्षम हो जाता है। स्मरण शक्ति बढ़ती है। विद्या वृद्धि में प्रगति स्वयं होने लगती है। एकादशाक्षर सरस्वती मंत्र : ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः।

दुर्गा सप्‍तशति में विद्या प्राप्ति के लिए  मंत्र :-
विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिय: समस्ता : सकला जगत्सु।त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्ति।।
अथर्ववेद में विद्या प्राप्ति के मंत्र--
यस्‍ते स्‍तन:शशयुर्यो मयोभूर्य: सुम्‍नयु:सुहवो य: सुदत्र:।
येन विश्‍वा पुण्‍यसि वर्याणि सरस्‍वति तमिह धातवे क:।।

अर्थात, हे देवी सरस्‍वती तू प्रार्थना योग्‍य है। तेरा ज्ञानरूपी स्‍तन पुष्टिदाता,सुख देनेवाला,मन को पवित्र करने वाला तथा शांति प्रदान करने वाला है। हमें भी तू वह प्राप्‍त करा।   
 यजुर्वेद में विद्या प्राप्ति के मंत्रयां मेधां देवगणा: पितरश्चोपासते।तथा मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा।।       अर्थात, हे सर्वज्ञाग्ने परमात्मन् जिस विज्ञानवती यथार्थ धारणावाली बुद्धि को विद्वानों के पितर धारण करते हैं तथा यथार्थ पदार्थ विज्ञान वाले पितर जिस बुद्धि के उपाक्षित होते हैं उस बुद्धि के साथ इसी समय कृपा से मुझको मेधावी करें। इसको आप अनुग्रह और प्रीति से स्वीकार कीजिए जिससे मेरी सारी जड़ता दूर हो।

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Saturday, April 23, 2016

तंत्र मंत्र यंत्र भाग 10

कुछ ऐसे सामान्‍य टोटके व मंत्र हैं जो आसानी से आपको प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इसी संबंध में नीचे कुछ बातों का जिक्र रहा हूं जिसे प्रयोग कर आप अपनी समस्‍याओं व उलझनों को दूर कर सकते हैं। 

1- काले तिल और जौ का आटा तेल में गूंथकर एक मोटी रोटी बनाएं और उसे अच्छी तरह सेंकें। गुड को तेल में मिश्रित करके जिस व्यक्ति की मरने की आशंका हो, उसके सिर पर से 7 बार उतार कर मंगलवार या शनिवार को भैंस को खिला दें।
* गुड के गुलगुले सवाएं लेकर 7 बार उतार कर मंगलवार या शनिवार व इतवार को चील-कौए को डाल दें, रोगी को तुरंत राहत मिलेगी।
* महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। द्रोव, शहद और तिल मिश्रित कर शिवजी को अर्पित करें। 'ॐ नमः शिवाय' षडाक्षर मंत्र का जप भी करें, लाभ होगा।

2- श्रावण के महीने में 108 बिल्व पत्रों पर चन्दन से नमः शिवाय लिखकर इसी मंत्र का जप करते हुए शिवजी को अर्पित करें। 31 दिन तक यह प्रयोग करें, घर में सुख-शांति एवं सम्रद्धि आएगी, रोग, बाधा, मुकदमा आदि में लाभ एवं व्यापार में प्रगति होगी व नया रोजगार मिलेगा। यह एक अचूक प्रयोग है।


3-बालक को जन्म के नाम से मत पुकारें।
* पांच वर्ष तक बालक को कपडे मांगकर ही पहनाएं।
* 3 या 5 वर्ष तक सिर के बाल न कटाएं।
* उसके जन्मदिन पर बालकों को दूध पिलाएं।
* बच्चे को किसी की गोद में दे दें और यह कहकर प्रचार करें कि यह अमुक व्यक्ति का लड़का है।
* घर में सुख-शांति के लिये मंगलवार को चना और गुड बंदरों को खिलाएं। आठ वर्ष तक के बच्चों को मीठी गोलियां बाँटें। शनिवार को गरीब व भिखारियों को चना और गुड दें अथवा भोजन कराएं। मंगलवार व शनिवार को घर में सुन्दरकाण्ड का पाठ करें या कराएं।


4- ससुराल में सुखी रहने के लिए साबुत हल्दी की गांठें, पीतल का एक टुकड़ा, थोड़ा सा गुड़ अगर कन्या अपने हाथ से ससुराल की तरफ फेंक दे, तो वह ससुराल में सुरक्षापूर्वक और सुखी रहती है। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए कन्या का जब विवाह हो चुका हो और वह विदा हो रही हो, तो एक लोटे (गड़वी) में गंगा जल, थोड़ी सी हल्दी, एक पीला सिक्का डाल कर, लड़की के सिर के उपर से ७ बार वार कर उसके आगे फेंक दें। 

5-परेशानियां दूर करने व कार्य सिद्धि हेतु शनिवार को प्रातः, अपने काम पर जाने से पहले, एक नींबू लें। उसके दो टुकड़े करें। एक टुकड़े को आगे की तरफ फेंके, दूसरे को पीछे की तरफ। इन्हें चौराहे पर फेंकना है। मुख भी दक्षिण की ओर हो। नींबू को फेंक कर घर वापिस आ जाएं, या काम पर चले जाएं। दिन भर काम बनते रहेंगे तथा परेषानियां भी दूर होंगी।


6-काम या यात्रा पर जाते हुए, एक नारियल लें। उसको हाथ में ले कर, ११ बार श्री हनुमते नमः कह कर, धरती पर मार कर तोड़ दें। उसके जल को अपने ऊपर छिड़क लें और गरी को निकाल कर बांट दें तथा खुद भी खाएं, तो यात्रा सफल रहेगी तथा काम भी बन जाएगा।
* अगर आपको किसी विशेष काम से जाना है, तो नीले रंग का धागा ले कर घर से निकलें। घर से जो तीसरा खंभा पड़े, उस पर, अपना काम कह कर, नीले रंग का धागा बांध दें। काम होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। हल्दी की ७ साबुत गांठें, ७ गुड़ की डलियां, एक रुपये का सिक्का किसी पीले कपड़े में बांध कर, रेलवे लाइन के पार फेंक दें। फेंकते समय कहें काम दे, तो काम होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।

7-धन के लिए एक हंडियां में सवा किलो हरी साबुत मूंग दाल या मूंगी, दूसरी में सवा किलो डलिया वाला नमक भर दें। यह दो हंडियां घर में कहीं रख दें। यह क्रिया बुधवार को करें। घर में धन आना शुरू हो जाएगा।


8-परीक्षा में सफलता हेतु गणेश रुद्राक्ष धारण करें। बुधवार को गणेश जी के मंदिर में जाकर दर्शन करें और मूंग के लड्डुओं का भोग लगाकर सफलता की प्रार्थना करें।
* पदोन्नति हेतु शुक्ल पक्ष के सोमवार को सिद्ध योग में तीन गोमती चक्र चांदी के तार में एक साथ बांधें और उन्हें हर समय अपने साथ रखें, पदोन्नति के साथ-साथ व्यवसाय में भी लाभ होगा।
* मुकदमे में विजय हेतु पांच गोमती चक्र जेब में रखकर कोर्ट में जाया करें, मुकदमे में निर्णय आपके पक्ष में होगा।
* पढ़ाई में एकाग्रता हेतु शुक्ल पक्ष के पहले रविवार को इमली के 22 पत्ते ले आएं और उनमें से 11 पत्ते सूर्य देव को ¬ सूर्याय नमः कहते हुए अर्पित करें। शेष 11 पत्तों को अपनी किताबों में रख लें, पढ़ाई में रुचि बढ़ेगी।
* कार्य में सफलता के लिए अमावस्या के दिन पीले कपड़े का त्रिकोना झंडा बना कर विष्णु भगवान के मंदिर के ऊपर लगवा दें, कार्य सिद्ध होगा।


9-गृह कलह से मुक्ति हेतु परिवार में पैसे की वजह से कलह रहता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख में पांच कौड़ियां रखकर उसे चावल से भरी चांदी की कटोरी पर घर में स्थापित करें। यह प्रयोग शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को या दीपावली के अवसर पर करें, लाभ अवश्य होगा।


10- शत्रु शमन के लिए साबुत उड़द की काली दाल के 38 और चावल के 40 दाने मिलाकर किसी गड्ढे में दबा दें और ऊपर से नीबू निचोड़ दें। नीबू निचोड़ते समय शत्रु का नाम लेते रहें, उसका शमन होगा और वह आपके विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाएगा।

Thursday, April 21, 2016

त्तंत्र मंत्र यंत्र भाग 9


व्यक्ति आम हो या खास, समस्या सबके पीछे रहती हैं। हम लोग छोटे-छोटे उपाय जानते हैं पर उनकी विधिवत जानकारी के अभाव में उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं। लेकिन तंत्र विज्ञान मे कुछ ऐसे टोटके हैं जिन्हे अपनाकर आप निश्चित ही अपनी सारी मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकते हैं।1-कार्यक्षेत्र में अनावश्यक दबाव पड़ता है तो :-
आप सोमवार को दो फूलदार लौंग और थोडा सा कपूर ले ,पहले अपने ईष्ट की विधिवत पूजा करले ,फिर उस कपूर और लौंग को 108 बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करे ,,अब कपूर लोग को जला दे ,अपनी दृष्टि लगातार उस पर बनाए रखे और गायत्री मंत्र का पाठ करते रहे ,,जब लौंग-कपूर पूरी तरह जल जाए तब ,उससे बनी भष्म या राख को इकठ्ठा कर ले ।आप इसे तीन बार [ सुबह,शाम और कार्यक्षेत्र में प्रवेश पर ] अपनी जिह्वा  पर थोडा सा लगाए । आप के कार्यक्षेत्र में आप पर दबाव 7 दिनों में कम हो जाएगा।मंत्र-।। नृसिंहाय विद्महे, वज्र नखाय धी महीतन्नो नृसिहं प्रचोदयात् ।।

2-मंत्र से सब करने लगेंगे आपकी तारीफ :-
कोई भी इंसान अपनी बुराई सुनना पसंद नहीं करता है। कोई भी नहीं चाहता कि उसका दुनिया में कोई भी दुश्मन हो। लेकिन कोई कितनी भी कोशिश कर ले उसका कोई ना कोई विरोधी जरूर रहता है। ऐसे में जब कोई आपके पीठ के पीछे आपकी बुराई करता है। सफलता के रास्ते में रोड़े अटकाता है। ऐसे में तनाव होना एक साधारण सी बात है।यह कोई नहीं चाहता कि इस दुनिया में उसका कोई दुश्मन भी हो। अपने विरोधियों अथवा शत्रुओं को शांत करने, अपने अनुकूल बनाने अथवा अपने वश में करने के लिये, नीचे दिये गए मंत्र का नियमबद्ध जप करना आश्चर्यजनक प्रभाव दिखाता है-

3- घर में खुशहाली के लिए :- घर या व्यापार स्थल के मुख्य द्वार के एक कोने को गंगाजल से धो लें और वहां स्वास्तिक की स्थापना करें और उस पर रोज चने की दाल और गुड़ रखकर उसकी पूजा करें। साथ ही उसे ध्यान रोज से देखें और जिस दिन वह खराब हो जाए उस दिन उस स्थान पर एकत्र सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें। यह क्रिया शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को आरंभ कर ११ बृहस्पतिवार तक नियमित रूप से करें। फिर गणेश जी को सिंदूर लगाकर उनके सामने लड्डू रखें तथा ÷जय गणेश काटो कलेश' कहकर उनकी प्रार्थना करें, घर में सुख शांति आ जागी।


4- सफलता प्राप्ति के लिए:- प्रातः सोकर उठने के बाद नियमित रूप से अपनी हथेलियों को ध्यानपूर्वक देखें और तीन बार चूमें। ऐसा करने से हर कार्य में सफलता मिलती है। यह क्रिया शनिवार से शुरू करें।


5-धन लाभ के लिए:-  शनिवार की शाम को माह (उड़द) की दाल के दाने पर थोड़ी सी दही और सिंदूर डालकर पीपल के नीचे रख आएं। वापस आते समय पीछे मुड़कर नहीं देखें। यह क्रिया शनिवार को ही शुरू करें और 7 शनिवार को नियमित रूप से किया करें, धन की प्राप्ति होने लगेगी।

Thursday, April 14, 2016

त्तंत्र-मंत्र-यंत्र भाग 8

तंत्र-मंत्र और यंत्र की अवधारना सभी धर्मों में है। हर धर्म को मामने वाले लोग दैहिक, दैविक और भौतिक ताप से मुक्ति और उसके शुभाशुभ फलाफल के लिए इसका उपयोग करते हैं। अंतर केवल उसके कार्यरुप का है।
हमारे वेदों (अथर्ववेद)में खासकर विभिन्‍न रोगों के उपचार के लिए ऐसे-ऐसे मंत्र दिए गए हैं जो अचूक हैं।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने चाहे जितनी प्रगति कर ली हो, पर बीमारियों पर नियंत्रण का उसका सपना आज तक अधूरा है।  आज जिन बीमारियों को लाइलाज माना जा रहा है, उनका मंत्रों के द्वारा स्थाई निवारण संभव है।
 जाने ऐसे ही कुछ दुर्लभ और गुप्त मंत्र-

मधुमेह रोग: मधुमेह यानि कि शुगर की बीमारी से छुटकारा पाने के लिये नौ दिन तक रुद्राक्ष की माला से आगे दिये गए निम्र मंत्र का 5 माला जप करें।
मंत्र - क्क ह्रौ जूं स:

कैंसर रोग: कैंसर के रोगी इंसान को नीचे दिये गए सूर्य गायत्री मंत्र का प्रतिदिन कम से कम पांच माला और अधिक से अधिक आठ माला जप, नियम पूर्वक एवं पूरी श्रृद्धा और विश्वास के साथ करना चाहिये। इसके अतिरिक्त दूध में तुलसी की पत्ती का रस मिलाकर पीना चाहिए। सूर्य-गायत्री का का जप एक अभेद्य कवच का काम करता है-
सूर्य गायत्री मंत्र - भास्कराय विद्यहे, दिवाकर धीमहि , तन्नो सूर्य: प्रचोदयात्।

Tuesday, April 12, 2016

नवग्रह देवता श्रृंखला - 9



                                          केतु

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मत्स्य व वायु पुराण के अनुसार समुद्रमंथन से प्राप्त अमृत को जब  भगवान विष्णु द्वारा देवताओं को पिलाया जा रहा था उसी क्रम में राहु भी वेश बदलकर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया और उसने भी अमृत पाण कर लिया। राहु कि इस करतूत को जब सूर्य और चंद्र ने देखा तो भगवान विष्णु को इसकी सूचना दी। इस पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से राहु का धड़ सिर से अलग कर दिया। राहु का वही धड़ केतु कहलाया। केतु बहुत से हैं इसमें धूमकेतु प्रधान है। केतु के अधिदेवता चित्रगुप्त हैं।

केतु का वर्ण :- केतु का वर्ण धूम्र है। सभी केतु द्विवाहु हैं। इनके मुख विकृत हैं।

आयुुध :- इनके दोनों हाथों में गदा तथा वरमुद्रा है।

केतु का वाहन :- गीध व कबूतर है।

केतु का निवास स्थान वायव्य कोण में है। केतु मीन राशि के स्वामी हैं।

केतु की वक्र दृष्टि से :- घाव होना, दांत का सडऩा, जल जाना, पस दायक बिमारी एवं गर्भ पात की संभावना बनी रहती है।

केतु की आराधना का वैदिक मंत्र :- ऊँ केतुं कृण्वन्न केतवे मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा:।।

केतु की आराधना का तांत्रिक मंत्र :- ऊँं ऐं हृीं केतवे नम:।

जप संख्या :- 68 हजार। इस दशांश 6800 तर्पण तथा इसका दशांश 680 मार्जन मंत्र से हवण करें। हवण में शमी या दुर्वा की आहुति आवश्यक है।

रत्न धारण :- लहसुनिया या लाजवर्त स्टोन को चांदी में बनवाकर शनिवार के दिन अभिषिक्त कर रात्रि में धारण करें। रत्न धारण संभव न हो सके तो वट वृक्ष की जड़ को काले कपड़े में बांधकर अभिषिक्त करने के पश्चात शनिवार के दिन ही रात्रि में बांह पर बांधे।

अभिषिक्त करने का मंत्र :- ऊँ कें केतवे नम:।

Wednesday, April 6, 2016

नवग्रह देवता श्रृंखला 8

                                      राहु 

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राहु की माता का नाम सिंहिका है। सिंहिका दैत्यराज हिरण्यकशिपु की पुत्री थी। राहु को सैहिकेय भी कहा जाता है। राहु कुल 100 भाई है। इनमें सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली भी राहु ही है। श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार समुद्र मंथन से जब अमृत प्राप्त हुआ तो राहु छलपूर्वक अमृत पान  के लिए देवताओं की पंक्ति में जा बैठा। उसके इस कपट को जब सूर्य और चंद्र देव ने भगवान विष्णु को बताया तब उन्होंने चक्र से उसका धड़ सिर से अलग कर दिया। किंतु अमृत पीने से वह अमर हो गया था। इसी कारण ब्रह्मा ने उसको ग्रह बना दिया। राहु ग्रह मंडलाकार होता है। यह ग्रहों के साथ ब्रह्मा की सभा में बैठता है। राहु हमेशा पृथ्वी पर ही भ्रमण करता है। यह छाया का अधिष्ठातृ देवता है। यह कन्या राशि का स्वामी है। इनका वास नेऋत्य कोण में है।
ऋग्वेद के अनुसार राहु वैर भाव से पूर्णिमा के दिन चंद्रमा को तथा अमावस्या के दिन सूर्य पर आक्रमण कर उसे आच्छन्न कर देता है। जिस कारण ग्रहण लगता है।

राहु का वर्ण :- मत्स्य पुराण के अनुसार राहु का वर्ण नीलमेघ के समान है और सिंहासन का रंग भी नीला है। राहु का मुख भयंकर है।

राहु का वाहन :- राहु का रथ अन्धकाररूप है। इसे कवच आदि से सजाये हुए वायु के समय वेगवाले  आठ घोड़े खींचते हैं। व्याध्र इनका वाहन है।

राहु का अायुद्ध :- इनके हाथ में तलवार, ढ़ाल, त्रिशुल और वरमुद्रा है।

राहु की वक्र दृष्टि से :- दिल का दौरा, विष संबंधी समस्या, आत्महत्या, पाचन संस्थान की गड़बड़ी, काम में बाधा, बनते काम विगडऩे आदि की संभावना बनी रहती है।

राहु की आराधना का वैदिक मंत्र :- 'ऊँ कयानश्चित्रऽआभुवदूती सदावृध: सखा। कयाशचिष्ठयाऽवृताÓ 

तांत्रिक मंत्र :- ऊँ ह्रीं राहवे नम:।

जप संख्या :- 72 हजार। इसका दशांश 7200 तर्पण व इसका दशांश 720 मार्जन तंत्र से हवन करें। हवन में दूर्वा का प्रयोग अवश्प करें।

रत्न :- गोमेद को चांदी में बंधवाकर शनिवार के दिन मध्यमा अंगुली में धारण करें। या फिर चंदन या अश्वगांधा की जड़ को काले या भूरे कपड़े में बांधकर मंत्र से अभिषिक्त कर शनिवार को ही बांह पर बांधे।

अभिषिक्त करने का मंत्र :- ऊँ रां राहवे नम:। 

व्रत :- शनिवार को उपवास करें। 

Tuesday, April 5, 2016

नवग्रह देवता श्रृंखला 7


                                 शनिदेव

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शनि भगवान सूर्य के पुत्र हैं। छाया इनकी माता हैं। ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। ब्रह्मवैैवर्त पुराण के अनुसार बचपन से ही शनि देव भगवान श्री कृष्ण के अनुराग से मग्न रहते थे। बड़ा होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया। पत्नी सती-साध्वी और तेजस्विनी थी। एक रात पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा से वह पति के पास पहुंची। पति ध्यान में बैठे थे। पति की प्रतिक्षा करते-करते वह थक गई। इस बीच उसका ऋतुकाल भी निष्फल हो चुका था। इसी उपेक्षा से क्रुद्ध होकर पत्नी ने शाप दे दिया कि जिसे तुम देख लोगे वह नष्ट हो जाएगा। ध्यान टूटने पर शनि देव ने पत्नी को मनाया। पत्नी को स्वयं पश्चाताप हो रहा था। लेकिन शाप के प्रतिकार की शक्ति उसमें न थी। तबसे शनि देव सिर नीचा करके रहने लगे। क्योंकि वे किसी का अहित नहीं चाहते थे। उनकी वक्र दृष्टि पड़ते ही कोई भी नष्ट हो सकता है। पश्चिम दिशा में इनका वास है।
महाराज दशरथ को दिए हुए वरदान के अनुसार शनि देव यदि किसी की कुण्डली या गोचर में मृत्यु स्थान, जन्म स्थान अथवा चतुर्थ स्थान मे रहे तो वह उनकी कुदृष्टि से सबसे अधिक पीडि़त यानि मृत्युतुल्य कष्ट भोगेगा। शनि देव प्रत्येक राशि में 30 30 महीने रहते हैं और 30 ही वर्ष में सब राशियों को पार करते हैं। शनि देव मकर और कुंभ राशि के स्वामी हैं। इनका गोत्र कश्यप है। इनके अधिदेवता प्रजापति तथा प्रत्याधिदेवता यम हैं।

शनि देव का वर्ण :- मत्स्य पुराण के अनुसार इनका वर्ण कृष्ण है।

शनि देव का वाहन :- इनका वाहन गिद्ध तथा रथ लोहे का बना हुआ है।

शनि देव का आयुध :- इनके हाथ में क्रमश: धनुष, वाण, त्रिशुल और वरमुद्रा है।


शनिदेव की वक्र दृष्टि से :- पेट और पैरों की बिमारी, गैस, पेड़ से गिरना, पत्थर से चोट लगना, वाहन दुर्घटना आदि की संभावना बनी रहती है। इनकी पीड़ा से आदमी राजा से रंक भी बन सकता है। हर वो कष्ट व परोशानियों की पराकाष्टा इनकी वक्र दृष्टि से संभव है।


शनि देव की पूजा का वैदिक मंत्र :- ऊं शन्नो देवीरभिष्टयऽआयो भवन्तु पीतपे। शं यो रमिस्रवन्तु न: ।।

तांत्रिक मंत्र :- ऊं ऐं हृीं श्रीं शनैश्चराय: नम:।

जप संख्या :-92 हजार। इसका दशांश 9200 तर्पण व इसका दशांश 920 मार्जन मंत्र का हवण करें। हवण में शमी की लकड़ी का उपयोग अवश्य करें।


रत्न :- नीलम या नीली चांदी में बनवाकर मध्यमा अंगुली में शनिवार को मध्याह्न काल में धारण करें। या फिर शनिवार को गिरे हुए काले घोड़े के नाल या नाव में लगी कील की अंगुठी बनवाकर धारण करें। बिच्छ या धतूरे की जड़ को भी काला कपड़ा में बांधकर अभिषिक्त कर भुजा में बांधने से भी काम चलेगा।

अभिषिक्त करने का मंत्र :- ऊं प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:।

विशेष:-शनिवार के दिन काला कुत्ता को भोजन कराने, काला उड़द, काली तील, सरसों तैल का दान या शनिदेव की मूर्ति पर अर्पित करने से भी शनि का प्रकोप कम होता है।

व्रत :- 33 शनिवार तक शनिवार का व्रत करें। हनुमान व शिव जी की उपासना तथा पिप्लादि ऋषि की पूजा अर्चना से भी शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है।

Saturday, April 2, 2016

नवग्रह देवता श्रृंखला 6

                                    शुक्र देव

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शुक्राचार्य दानवों के पुरोहित हैं। ये योग के आचार्य हैं। मृतसंजीवनी विद्या के बल पर ये मरे हुए दानवों को भी जिला देते हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार शुक्राचार्य ने दानवों के कल्यानार्थ अनेक कठिनतम व्रत का अनुष्ठान किया जिसे आज तक कोई नहीं कर पाया। इससे प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव ने इन्हें वर दिया कि तुम युद्ध में देवताओं को भी पराजित कर दोगे और तुम्हें कोई नहीं मार सकेगा। साथ ही इन्हें धनों का अध्यक्ष और प्रजापति बना दिया। इतना ही नहीं इन्हें समग्र औषधियों, मंत्रों और रसों के भी स्वामी बना दिया गया। ब्रह्मा की प्रेरणा से शुक्राचार्य ग्रह बनकर तीनों लोकों के प्राण का परित्राण करने लगे। महाभारत के अनुसार कभी वृष्टि, कभी अवृष्टि, कभी भय, कभी अभय उत्पन्न कर वे प्राणियों के योग क्षेत्र का कार्य पूरा करते हैं। ये लोकों के लिए अनुकूल ग्रह हैं। इनके अधिदेवता इंद्राणी और प्रत्यधिदेवता इंद्र है। वृष और तुला राशि के स्वामी हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार इनका वर्ण श्वेत है।

शुक्रदेव का वाहन :- इनके रथ में अग्नि के समान वर्णवाले आठ घोड़े जूते होते हैं। रथ पर ध्वजाएं फहरती रहती है।

शुक्रदेव का परिवार :- शुक्राचार्य की दो पत्नियां है। एक का नाम गो है जो पितरों की कन्या है। वहीं दूसरी का नाम जयंती है जो देवराज इंद्र की पुत्री है। गो से इन्हें चार पुत्र हुए - त्वष्टा, वरुत्री, शंड़ और अमर्क जबकि जयंती से देवयानी का जन्म हुआ।

शुक्र की वक्र दृष्टि से :- कोढ़, पित्त, कफ संबंधी रोग, वीर्य विकार, नेत्र पीड़ा, मूत्र पीड़ा, गुदा रोग, गर्भाशय की कमजोरी, पेट का दर्द अथवा अण्डकोश में सूजन आदि होने की संभावना बनी रहती है।

शुक्र ग्रह के जप का वैदिक मंत्र :- ऊॅ अन्नात्परिस्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिवत् क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:।
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानर्ठ शुक्रमन्धरस इंद्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।।

शुक्र ग्रह के जप का तांत्रिक मंत्र :- ऊं ह्रीं श्रीं शुक्राय नम:।

जपसंख्या :- 16 हजार। इसका दशांश 1600 तर्पण व इसका दशांश 160 मार्जन हवण करें। हवण में गूलर की लकड़ी का प्रयोग करें।

रत्न धारण - हीरा, जरकन या सफेद पुखराज की अंगुठी बनवाकर शुक्रवार को सूर्योदय काल में कनिष्ठा अंगुली में धारण करें। या फिर मजीदी या अरंडी की जड़ को सफेद कपड़े में बांधकर अभिषिक्त कर गले या बाजू में बांधे।

अभिषिक्त करने का मंत्र :- ऊॅं द्रां द्रींं स: शुक्राय नम: को 101 बार पढ़ें।

व्रत - शुक्रवार का व्रत करें और पूजा में सफेद पुष्प व सफेद वस्तुओं का ही यथासंभव प्रयोग करें।

Thursday, March 31, 2016

नवग्रह देवता श्रृंखला-5

                बृहस्पति देवता

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बृहस्पति देव अंगिरा ऋषि के पुत्र हैं। यह देवताओं के गुरु हैं। ये अपनी शक्ति से रक्षोघ्न मंत्रों का प्रयोग कर दैत्यों को दूर भगा देवताओं को उनका यज्ञ भाग प्राप्त करा देते हैं।
 स्कंद पुराण के अनुसार बृहस्पति अपने अभ्युदय के लिए घोर तपस्या करने लगे। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ही भगवान भोलेनाथ ने इन्हें देवताओं के पूज्य गुरु और ग्रहत्व प्रदान किया। बृहस्पति प्रत्येक राशि पर एक-एक वर्ष रहते हैं। वक्र होने पर इसमें अंतर आ जाता है। बृहस्पति स्वयं सुन्दर हैं। ये विश्व के लिए वरणीय हैं। ये वांछित फल प्रदान कर संपत्ति और बुद्धि से भी संपन्न कर देते हैं। ये आराधकों को सन्मार्ग पर चलाते हैं और उनकी रक्षा भी करते हैं।

बृहस्पति देव का वर्ण :-मत्स्य पुराण के अनुसार इनका वर्ण पीत है। यह धनु व मीन राशि के  स्‍वामी हें।

वाहन- इनका वाहन रथ है जो सोने का बना है। इसमें वायु के समान वेग वाले पीले रंग के 8 घोड़े जुते हैं।

आयुद्ध :- ऋग्वेद के अनुसार इनका आयुद्ध स्वर्णनिर्मित दण्ड है।

बृहस्पति देव का परिवार :-इनकी पहली पत्नी का नाम शुभा और दूसरी का तारा है। शुभा से सात कन्याएं हुई जबकि तारा से सात पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुई। बृहस्पति के दो भाई हैं। बड़े भाई का नाम-उतथ्य और छोटे का नाम संवर्त है। इनकी एक बहन भी है जिसका नाम वरस्री है।
बृहस्पति के अधिदेवता इन्द्र और प्रत्यधिदेवता ब्रह्मा हैं। इनके चार हाथों में क्रमश: दण्ड, रूद्राक्ष की माला, कमण्डलु और वरद मुद्रा है।


गुरु बृहस्पति की वक्र दृष्टि से :-पेट में गैस रहना, बुखार, कान से मवाद गिरना, वायुयान दुर्घटना आदि की संभावना रहती है।

बृहस्पति देव का आह्वाहन मंत्र :-देवदैत्यगुरु तद्वत पीतश्वेतौ चतुर्भुजो।
                                                   दण्डिनौ वरदो कार्यों साक्षसूत्रकमण्डलू।।

वैदिक मंत्र :- ऊं बृहस्पतेऽअति यदर्याेऽअर्हाद्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
                      यदीदयच्छं वसऽऋतप्रजा तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।।

तांत्रिक मंत्र :- ऊं ऐं क्लीं बृहस्पतये नम:।

जप संख्या :-76 हजार। इसका दशांश 7600 तर्पण व इसका दशांश 760 मार्जन हवण करें। हवण में पीपल की लकड़ी का उपयोग अवश्‍य करें।

रत्न धारण :-पुखराज, उपरत्न टोपाज सोने में बनाकर गुरुवार के दिन तांत्रिक मंत्र से अभिषिक्त कर दोपहर बाद धारण करना चाहिए।
जातक रत्न के बदलें केले की जड़ या हल्दी की गांठ को भी पीले कपड़े में लपेटकर पीला धागा से बांधकर गंगा जल में धोएं और उपरोक्त मंत्र से अभिषिक्त कर दाहिने बाजू में (पुरूष) बाएं में महिला धारण करें।

व्रत :-गुरुवार को बृहस्पति देव की कथा सुनें और उपवास रखें। जो जातक उपवास नहीं रख सकते वह पूजा के बाद पीला भोजन करें।.

Sunday, March 27, 2016

तंत्र-मंत्र-यंत्र भाग 6

इस कड़ी में  तंत्र-मंत्र-यंत्र से जुड़े कुछ ज्ञानवर्धक बातें दी जी रही है जिसकी जानकारी साधक को अवश्‍य होनी चाहिए।

1--किस माला से किस देवी देवता का जाप करें:- 
रूद्राक्ष की माला :- श्री गायत्री, श्री दुर्गा, शिव,गणेश व मां पार्वती।

तुलसी की माला :- श्री राम, श्री कृष्ण, सूर्यनारायण व विष्णु।

स्फटिक का माला :- श्री दुर्गा जी, श्री सरस्वती जी, गणेश।

सफेद चंदन की माला :-सभी देवी देवताओं के लिए।

लाल चंदन की माला :-श्री दुर्गा जी।

कमलागट्टे की माला :-श्री लक्ष्मी जी।

हल्दी की माला :- मां बंगलामुखी
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2--अनबुझ मुहूर्त :-

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, अक्षय तृतीया, दशहरा, दीपावली(सायं काल के बाद)। उपरोक्त मुहूर्तों को अनबूझ मुहूर्त कहा जाता है। इन मुहूर्तों में कोई भी काम शुरू करने से सफलता मिलती है।

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3--अशोक वृक्ष का महत्व:- 
1.अशोक वृक्ष के नीचे जप- तप आदि करने से कार्य शीघ्र सफल होता है।
2.किसी विशेष कार्य के लिए जाते समय यदि अशोक वृक्ष का एक पत्ता तोड़कर अपने पास रखें तो कार्य सफल होगा।
3.अशोक वृक्ष के फूल को प्रतिदिन सिल पर पीसकर शहर मिलाकर लगातार खाने से भाग्य दोष और दरिद्रता दूर होती है।
4.इसके तीन पत्तों को प्रतिदिन सुबह खाली पेट चबाने से मानसिक तनाव  दूर होता है।
5.अशोक वृक्ष के बीज को तांबे के ताबीज में डालकर गले में धारण करने से सभी प्रकार के लाभ होते है।
6. चैत्र शुक्त पक्ष अष्टमी का व्रत रखने तथा अशोक की आठ पत्तियों को खाने से स्त्री की संतान कामना पूत्र्ति होती है।

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4--धन प्राप्ति के अचूक उपाय :-
1- शनिवार के दिन पीपल का एक पत्ता तोड़कर उसे गंगाजल से धोकर उसके ऊपर हल्दी तथा दही के घोल से अपने दाएं हाथ की अनामिका अंगुली से ह्रीं लिखें। इसके बाद इस पत्ते को धूप-दीप दिखाकर अपने बटुए में रखे लें। प्रत्येक शनिवार को पूजा के साथ वह पत्ता बदलते रहें। यह उपाय करने से आपका बटुआ कभी धन से खाली नहीं होगा। पुराना पत्ता किसी पवित्र स्थान पर ही रखें।
2- काली मिर्च के 5 दाने अपने सिर पर से 7 बार उतारकर 4 दाने चारों दिशाओं में फेंक दें तथा पांचवें दाने को आकाश की ओर उछाल दें। यह टोटका करने से आकस्मिक धन लाभ होगा।

3- अचानक धन प्राप्ति के लिए सोमवार के दिन श्मशान में स्थित महादेव मंदिर जाकर दूध में शुद्ध शहद मिलाकर चढ़ाएं।
4- अगर धन नहीं जुड़ रहा हो तो तिजोरी में लाल वस्त्र बिछाएं।
5- तिजोरी में गुंजा के बीज रखने से भी धन की प्राप्ति होती है।
6- जिस घर में प्रतिदिन श्रीसूक्त का पाठ होता है, वहां लक्ष्मी अवश्य निवास करती हैं।

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5--किसी भी प्रकार के रोगों को झाडऩे का मंत्र :-
'ऊँं ऐं श्रीं हीं्र हीं्र स्फ्रें ख्फ्रें ह्सौं ह्स्फें ह्सौं ऊँ नमो हनुमते स्फोटकं क्षतज्वरमैकाहिकं द्वयहिकं चातुर्थिकं सन्ततज्वरं सान्निपातिकज्वरं भूतज्वरं मन्त्रज्वर-शूल-भगन्दर- मूत्रकृच्छ्र-कपालशूल-कर्णशूला-ऽक्षिशूलोदरशूल-हस्तशूल-पादशूलादीन सर्वव्याधीन् क्षणेन भिन्धि-भिन्धि छिन्दी छिन्दी नाशय नाशय निकृन्तय निकृन्तय छदेय छेदय भेदय भेदय महावीर हनुमान घे घे हीं्र हीं्र हूं हूं फट् स्वाहा।Ó

प्रयोग विधि :- शनिवार व मंगलवार के दिन श्रीहनुमान जी का ध्यान और प्रणाम कर कुशा या चाकू से दस मं- को पढ़ते हुए रोगी को झाडऩे से समस्त रोग समूल रूप से नष्ट हो जाते हैं।
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6--भूत-प्रेत आदि समस्त विघ्न बाधाओं को झाडऩे का मंत्र :- 

'ऊँं ऐं श्रीं हीं्र हीं्र स्फ्रें ख्फ्रें ह्सौं ह्स्फें ह्सौं ऊँ नमो हनुमते महाबलपराक्रम मम परस्य च भूत-प्रेत-शिाच-शाकिनी-डाकिनी-यक्षिनी-पुतना-मारी-महामारी-कृत्या-यक्ष-राक्षस-भैरव-वेताल-ग्रह-ब्रहाग्रह-ब्रह्मराक्षसा-दिकजात-क्रूरबाधान क्षणेन हन हन जम्भय जम्भय निरासय निरासय वारय वारय बन्धय बन्धय नुद-नुद सूद-सूद धुनु धुनु मोचय मोचय मामेनं मामेनं च रक्ष रक्ष महामाहेश्वर रुद्रावतार हा्र हा्र हा्र हुं हुं घे घे घे हूं फट् स्वाहा।Ó

प्रयोग विधि :-श्री हनुमान जी का ध्यान कर भूत-प्रेत आदि बाधाग्रस्त रोगी पर उपर्युक्त मंत्र को पढ़ते हुए पीला सरसों का दाना फेकने से उपरोक्त सभी बाधाएं शीघ्र दूर हो जाती है। 

Saturday, March 26, 2016

नवग्रह देवता श्रृंखला 4


                         बुध देव
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अथर्ववेद के अनुसार बुध देवता के पिता का नाम चंद्रमा और माता का नाम तारा है। वहीं श्रीमद् भागवत गीता के अनुसार ब्रह्मा ने इनका नाम बुध इसलिए रखा कि इनकी बुद्धि बहुत ही गंभीर है। ये सभी शास्त्रों के परांगत, हस्तिशास्त्र के प्रवर्तक, सूर्य के समान तेजस्वी और चंद्रमा के समान कांतिमान हैं। जबकि मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने ब्रह्मर्षियों के साथ बुध देवता को पृथ्वी के राज्य पर अभिषिक्त किया और ग्रह भी बना दिया।

बुध परिवार :- बुध का विवाह मनु पुत्री इला के साथ हुआ। इला से पुरूरवा की उत्पत्ति हुई।

बुध ग्रह प्राय: मंगल ही करते हैं। किंतु जब ये सूर्य की गति का उल्लंघन करते हैं तब आंधी-पानी और सूखे की आशंका बन जाती है।

वाहन - इनका रथ श्वेत और प्रकाश से दिप्त है। इसमें वायु के समान वेग वाले पीले रंग के दस घोड़े जुते रहते हैं।

बुध देव की आकृति:- इनका रंग कनेर पुष्प की भांति पीला है। बुध पीले रंग की पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं। ये अपने चारो हाथों में क्रमश: तलवार, ढ़ाल, गदा और वरद मुद्रा धारण किए रहते है। ये सिंह की भी सवारी करते हैं।

 बुध के अधिदेवता और प्रत्यधिदेवता विष्णु हैं। इसीलिए इनका ध्यान इस मंत्र से करना चाहिए।
पीतमाल्याम्बरघर : कर्णिकारसमद्युति:। खड्गचर्मगदापाणि: सिंहस्थो वरदो बुध:।।

बुध की वक्र दृष्टि से :- दिमागी फितुर, नाक-कान की बिमारी, बात संबंधी रोग, पित्त रोग, चर्मरोग कोढ़, विष तथा गिरने आदि की संभावना बनती है।
बुध की वक्र दृष्टि से होने वाली  पीड़ा से निवृति के लिए 27 या 108 बुधवार का व्रत करना चाहिए। गाय को हरा चारा खिलाना भी फायदेमंद होता है।

क्लेश निवारण हेतु वैदिक मंत्र :- ऊं उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूत्र्ते स र्ठ सृजेथामयं च। अस्मिन्त्सधस्थे अध्यत्तुरस्मिन। विश्वे देवा यजमानश्च सीदत।।

क्लेश निवारण हेतु तांत्रिक मंत्र :- ऊॅ ऐं श्रीं श्रीं बुधाय नम:।

जप संख्या 36 हजार । इसका दशांश 3600 तर्पण। इसका दशांश 360 मार्जन हवण करें।

रत्न धारण - पन्ना या विधारा अथवा हरा मरगज की जड़ को विधि पूर्वक मंत्र से अभिषिक्त कर हरे कपड़े में हरे धागे में बांधकर बुधवार के दिन 10 बजे से पूर्व बांह पर बांधें। पन्ना की अंगुठी सोने मे बनवाएं और बुधवार को ही उपरोक्त विधि के अनुसार ही कनिष्ठा अंगुली में धारण करें।

Tuesday, March 22, 2016

नवग्रह देवता श्रृंखला-3

                  चंद्र देव

चंद्रदेव महर्षि अत्रि के पुत्र हैं। सोलह कलाओं से युक्त होने के कारण इन्हें सर्वमय कहा गया है। श्रीमद् भगवत् गीता के अनुसार चंद्र देव ही सभी देवता, पितर, मनुष्य, भूत, पशु, पक्षी, सरीसृप और आदि प्राणियों के प्राण का आप्यायन करते हैं। ब्रह्म देव ने चंद्रमा को बीज, ओषधि, जल तथा ब्राह्मणों का राजा बना दिया। प्रजापति दक्ष ने अश्विनी, भरणी सहित अपनी 27 कन्याओं का विवाह चंद्र देव से कराया। ये 27 कन्याएं ही 27 नक्षत्र कहलाती है। (हरिवंश पुराण के अनुसार) इन नक्षत्र रूपी पत्नी के साथ चंद्रदेव परिक्रमा करते हुए प्राणियों के पोषण के साथ-साथ पर्व, संधियों एवं विभिन्न मासों का विभाजन करते हैं। महाभारत के अनुसार-पूर्णिमा को चन्द्रोदय के समय तांबे के बर्तन में मधुमिश्रित पकवान को यदि चंद्र देव को अर्पित किया जाय तो इससे इनकी तृप्ति होती है।


चंद्रमा का वर्ण श्वेत है। यह कर्क राशि के स्वामी हैं। इनका गोत्र-अत्रि है।
चंद्र परिवार :-इनकी कुल 27 पत्नियां है जो विभिन्न नक्षत्रों के नाम से जानी जाती हंै। इनका पुत्र बुध है जो तारा से उत्पन्न हुआ है।

मत्स्य पुराण के अनुसार-इनका वाहन रथ है। इस रथ में तीन चक्र होते हैं। रथ में 10 घोड़े जुते होते हैं। इनके नेत्र और कान भी गौर वर्ण का है। स्वयं चंद्र देव शंख के समान उज्जवल हैं। इनके एक हाथ में गदा तथा दूसरे हाथ वरदमुद्रा में है।
चंद्र के वक्र दृष्टि से :- अनिन्द्रा, कफ संबंधी रोग, पाचन संस्थान का बिगडऩा, अजीर्ण, ठंडक, बुखार, गठिया, मानसिक असंतुलन, पेट संबंधी बीमारियां आदि होने की संभावना रहती है।

चंद्र देव की शाति के लिए तांत्रिक मंत्र :- ऊँ ऐं ह्रींं सोमाय नम:।

चंद्र देव की शाति के लिए वैदिक मंत्र :- ऊँ इमं देवाऽअसपत्न र्ठ सुवध्वं महते क्षत्राय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्यै पुत्रम मुस्यै विष एष वोऽमीराजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना र्ठ राजा।।

जप संख्या :- 44 हजार। इसका दशांश 4400 तर्पण। इसका दशांश मार्जन 440 हवन करें।

रत्न :- मोती धारण सोमवार या पूर्णिमा की रात्रि। या खिडऩी की जड़ सोमवार प्रात:सफेद कपड़े में सफेद धागे से बांधकर 'ऊं सों सोमाय नम:Ó से अभिषिक्त कर धारण करें।

व्रत-सोमवार का व्रत या पूर्णिमा को उपवास करें।
चंद्रदेव की पूजा में श्वेत वस्तुओं, फूलों आदि का प्रयोग करें।

Monday, March 21, 2016

नवग्रह देवता-श्रृंखला 2

                            मंगल देव
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार बाराह रूप धारी भगवान और पृथ्वी देवी के समागम से मंगल ग्रह का जन्म हुआ। इनका गोत्र भारद्वाज है। भविष्य पुराण के अनुसार मंगल ग्रह के पूजन की बड़ी महिमा है। इस व्रत के लिए  ताम्रपत्र पर भौमयंत्र लिखकर मंगल की सुवर्णमय प्रतिमा प्रतिष्ठापित कर पूजा का विधान है। व्रत के लिए जिस मंगलवार को स्वाति नक्षत्र मिले उसी में मंगलवार का व्रत शुरु करना चाहिए। पद्म पुराण के अनुसार , मंगल देवता के नामों का पाठ करने से ऋण से मुक्ति मिलती है। मंगल को अशुभ ग्रह माना जाता है।

मत्स्य पुराण के अनुसार मंगल ग्रह का वर्ण लाल है।

वाहन :- इनका वाहन सुवर्ण निर्मित रथ है। जिमें लाल रंग वाले घोड़े जुते रहते हे। रथ पर अग्नि से उत्पन्न ध्वजा लहराता रहता है। इस रथ पर बैठकर मंगल देवता कभी सीधी तो कभी वक्रगति से विचरण करते हैं।

स्वरूप :-भूमिपुत्र मंगल चतुर्भज रूप धारी हैं। इनके शरीर के रोयें भी लाल है। इनके हाथों में शक्ति, त्रिशूल, गदा और वरदमुदा्र है। इनका वस्त्र व माला भी लाल है।

मंगल की वक्र दृष्टि से :- गले की बिमारी, कंठ रोग, फोड़ा-फुंसी, रक्त विकार, गठिया का बुखार, आंखों की बिमारी, दौरा पडऩा, सिर दर्द ,दुर्घटना का भय, पारिवारिक उपद्रव, मुकदमें तथा न्याय में हानि, वैवाहिक जीवन में तनाव आदि की संभावना रहती है।।

मंगल की उपासना के लिए वैदिक मंत्र :- ऊॅ अग्निर्भूद्र्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपर र्ठ रेता र्ठ सि जिन्वति: ।

मंगल की उपासना के लिए तांत्रिक मंत्र :- ऊॅ हा्रीं श्रीं मंगलाय नम : ।

जप संख्या : 40 हजार। इनका दशांश 4000 तर्पण व इसका दशांश 400 मार्जन हवण करें।

मंगल देव का आह्वान मंत्र :- रक्तमल्याम्बरधर: शक्तिशूल गदाधर:। चतुर्भुज: रक्तरोमा वरद: स्याद् धरासुत:।।

मंगलवार का व्रत :- इसमें हनुमान जी का व्रत या सुंदरकांड का पाठ अति फलदायी होता है। पूजा में ध्यान रहे कि अधिकतर सामग्री का प्रयोग लाल रंग का ही हो। यथा लाल वस्त्र, लाल चंदन, लाल फूल, मंूगा की माला आदि।

रत्न धारण :- मूुंगा  या फिर सौंफ की जड़ को विधान पूर्वक निकालकर गंगा जल से पवित्र करें। फिर उसे अभिषिक्त का लाल कपड़े में लाल धागे से बांधकर मंगलवार के दिन बाजू या गले में धारण करें। ध्यान रहें मूंगा या जड़ी का धारण जिस दिन मंगलवार कर स्वाति नक्षत्र रहे उसी में धारण करना अति उत्तम होगा।
अभिषिक्त करने का मंत्र :-  ऊं भ्रौं भौमाय नम:।

Thursday, March 17, 2016

नवग्रह देवता - श्रृखंला-1

                             सूर्य देव
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ऋग्वेद के अनुसार सौर मंडल के अन्त: स्थित सूर्य देव सबके प्रेरक, अन्तर्यामी और परमात्म स्वरूप हैं। ये ही समस्त स्थावर व जंगम के कारण हैं। सूर्यदेव सम्पूर्ण ग्रहों के राजा हैं। साम्ब पुराण के अनुसार- सूर्य की हजारों रश्मियों में से 300 रश्मियां पृथ्वी पर, 400 चन्द्रमस- पितृलोक पर तथा 300 देवलोक में प्रकाश फैलाती है। रश्मि के साथ सूर्य तेज का प्रकाश तथा अग्नितेज की ऊष्मा के परस्पर मिश्रण से ही दिन बनता है। केवल अग्नि की ऊष्मा के साथ सूर्य का तेज मिलने पर रात्रि होती है।

ऋग्वेद के अनुसार-
 सूर्य देवता का रंग लाल है। इनका वाहन रथ है। इनका रथ वेदस्वरूप है। इनके रथ में एक ही चक्र है जो संवत्सर कहलाता है। इस रथ में मासस्वरूप बारह अरे हैं। ऋतु रूप छ:ह नेमियां है और तीन चौमासे रूप में तीन नाभियां हैं। इसकी पुष्टि श्रीमद् भागवत गीता (5। 21। 13) में भी की गई है। इस रथ में अरूण नामक सारथि ने गायत्री आदि सात छन्दों के सात घोड़े जोत रखे हैं। (ऋग्वेद 1। 105। 31) सारथि का मुख भगवान सूर्य की ओर रहता है। भगवान सूर्यनारायण का गोत्र कश्यप है।

सूर्य परिवार - भगवान सूर्य की दो पत्नियां है। संज्ञा और निक्षुमा। संज्ञा को ही सुरेणु, राखी, द्यौ, त्वाष्ट्री एवं प्रभा भी कहा जाता है जबकि निक्षुमा को छाया भी कहा जाता है। संज्ञा विश्वकर्मा त्वष्टा की पुत्री है। संज्ञा से वैवस्वतमनु, यम, यमुना, अश्विनी कुमार और रैवन्त तथा छाया से शनि, तपती, विष्टि और सावर्णिमनु नामक संतान हुए। दिण्डि इनके मुख्य सेवक हैं।

सूर्य की शक्तियां :- अग्नि पुराण के अनुसार इनकी कुल 12 शक्तियां हैं जिनके नाम क्रमश: इड़ा, सुषुम्ना, विश्वर्चि, इन्दु, प्रमर्दिनी, प्रहर्षिणी, महाकाली, कपिला, प्रबोधिनी, नीलाम्बरा, घनान्त: स्था और अमृता  है।

सूर्यदेव के  अस्त्र-शस्त्र :-
चक्र, शक्ति, पाश, अंकुश। सूर्यदेव की दो भुजाएं हैं। वे अपने रथ पर जो सात घोड़ों व सात रस्सियों से जुड़े रहते हंै उसपर कमल आसन पर विराजमान रहते हैं।

सूर्य की वक्र दृष्टि से:-बुखार, कमजोरी, दिल का दौरा, चर्मरोग, आंख संबंधी बीमारी, हिस्टीरिया आदि की संभावना बनती है।

सूर्यदेव सिंह राशि का स्वामी हैं। इनकी कृपा प्राप्ति के लिए दो मार्ग बताए गए हैं।
1 वैदिक, 2 तांत्रिक
वैदिक रूप से जप किया जाने वाला मंत्र है: -
'पद्मासन: पद्मकर: पद्मगर्भ: समद्युति:। 
सप्ताश्व: सप्तरज्जुश्च द्विभुज: स्यात् सदा रवि:।।
                                                 Ó  मत्स्य पुराण-94

तांत्रिक रूप से जप किया जाने वाला मंत्र है: -
'उं ह्रीं ह्रीं सूर्याय नम:।Ó

जपसंख्या- 28 हजार। इसका दशांश (2800) तर्पण, इसका दशांश (280) मार्जन हवन करना चाहिए।

व्रत-रविवार का व्रत करना चाहिए। न चले तो रविवार को कम से कम नमक नहीं खाएं। सूर्य देव पर ताम्र के बर्तन से जल अर्पित करें, लाल पुष्प चढ़ाएं, लाल चंदन का प्रयोग करें।

रत्न-माणिक्य धारण करें अथवा बिल्वपत्र वृक्ष की जड़ को विधिपूर्वक लाकर उसे गंगा जल से धोकर अभिशिक्त कर लाल कपड़े में बांधकर लाल धागे में रविवार को बांह या गले में धारण करें।

Tuesday, March 15, 2016

तंत्र-मंत्र-यंत्र भाग 5

आदि शक्ति दुर्गा ही महाकाली, महालक्ष्मी और महा सरस्वती के रूप में त्रिधारूप हैं। इनके प्रभाव और महत्व का वर्णन करना सामथ्र्य के बाहर की बात है। इसलिए तो स्वयं महादेव ने इन्हें देवताओं के लिए देव शक्ति, तपस्वियों के लिए तप:शक्ति, साधना करने वालों के लिए साधना शक्ति, राजाओं के लिए राजशक्ति, ब्राह्मणों के लिए विद्याशक्ति, क्षत्रियों के लिए बलशक्ति, वैश्यों के लिए लक्ष्मीशक्ति, शूद्रों के लिए महत्वशक्ति, गृहस्थों के लिए मायाशक्ति, भक्तों के लिए भक्तिशक्ति, स्त्रियों के लिए सौभाग्यशक्ति और सर्वसाधारण के लिए कल्याणशक्ति कहा है। इस  ब्रह्मांड की आधारभूत शक्ति यही हंै। क्योंकि भगवान विष्णु में सात्विक, ब्रह्मा में राजसी और शिव में तामसी शक्ति के रूप में विद्यमान रहने वाली यह आद्याशक्ति है।
 मां भगवती की पूजा के तीन विधान हैं - 1.सात्विकी 2.राजसी 3.तामसी। इन तीनों में सात्विक पूजा का विशेष महत्व है। गृहस्थ जन को सात्विक पूजा ही करनी चाहिए। इसीलिए तो गृहस्थों के लिए मार्कण्डेय पुराण अंतर्गत दुर्गा सप्तशती में कुछ विशेष याचना और इच्छा रूपी फल की प्राप्ति के लिए विशेष मंत्र के अनुष्ठान की बात कही गई हैं। जिसका जप और हवन नियमानुसार करने से उसकी प्राप्ति हो जाती है।

नीचे उक्त मंत्रों की शृंखला है जिसका याचक सुविधानुसार विधि विधान के अनुसार अनुष्ठान कर मनोवांछित की प्राप्ति कर सकता है--


सामूहिक कल्याण के लिए :-
देव्या यथा ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शोवदेवगणशक्ति समूहमूत्र्या।
तामस्बिकामखिलदेवमहर्षि पूज्यांं भक्त्या नता: स्म विदधातु शुभानि न:।।

विपत्ति नाश के लिए :-
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारयणि नमोऽस्तु ते।।

भय नाश के लिए :-
ज्वालाकराल मत्युग्रमशेषासुरसूदनम्। त्रिशूलं पातु नो भीतेर्मद्रकालि नमोऽस्तु ते।।

पाप नाश के लिए :-
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्ण या जगत।
सा घंटा पातु नो देवि पापेभ्योऽन: सुतानिव।।

बाधा शान्ति के लिए :-
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रेलोक्यस्याखिलेश्वरी। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्।।

सुलक्षणा पत्नी की प्राप्ति के लिए :-
पत्नी मनोरमां देहि मनोवृतानुसारिणीम्। तारिणी दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भाम।।

आरोग्य और सौभाग्य प्राप्ति के लिए :-
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
 रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।

महामारी नाश के लिए :-
जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
 दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।

रोग से छुटकारा प्राप्ति के लिए :-
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान।
त्वमाश्रितानां न विपन्नराणां त्वमाश्रिता हा्राश्रयतां प्रयन्ति।।

रक्षा प्राप्ति के लिए :-
शूलेन पाहि न देवि पाहिखड्गेन चाम्बिके।
 घंटास्वनेन न: पाहि चापज्यानि: स्वनेन च ।।

शक्ति प्राप्ति के लिए :-
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
 गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तुते।।


प्रसन्नता प्राप्ति के लिए :-
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणी। त्रैलोक्यवासिनामीडये लोकानां वरदा भव।।

विद्या प्राप्ति के लिए :-
विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा:
 स्त्रिय: समस्ता : सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्ति।।

दारिद्र व दु:ख निवारण के लिए :-
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो: स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्रयदु:खभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरयणाय सदाऽऽर्द्रचिता।।

सब प्रकार के कल्याण के लिए :-
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते।।

बाधामुक्त होकर धन पुत्रादि की प्राप्ति के लिए :-
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धन धान्यसुतान्वित:।
 मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:।।

पाप नाश तथा भक्ति की प्राप्ति के लिए:-
नतेभ्य: सर्वदा भक्तया चण्डिके दुरितापहे।
 रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।

स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति के लिए:-
सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी। त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तय:।।

विविध उपद्रवों के बचाव के लिए:-
रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र।
दावानतो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम्।।

समस्त बाधाओं का नाश एवं देवि की शरणागति के लिए :-
इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।
 तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्।।

विश्व की रक्षा के लिए :-
या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी: पापात्पनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम्।।

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Saturday, March 5, 2016

तंत्र- मंत्र- यंञ भाग -4

सिद्ध कुण्जिका स्तोत्र का पाठ करने मात्र से दुर्गासप्तशती का मिलता है फल

श्री मार्कण्डेय पुराण अंतर्गत देवी महात्मय में कुल 700 श्लोक हैं। यह महात्म्य दुर्गा सप्तशती के नाम से प्रसिद्ध है। दुर्गा सप्तशती धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारो पुरूषार्थों को प्रदान करने वाली है। जो पुरुष जिस भाव और जिस कामना से श्रद्धा एवं विधि के अनुसार दुर्गा सप्तशती का पाठ करता है उसे उसी भावना और कामना के अनुसार निश्चय ही फल की प्राप्ति होती है। लेकिन सप्तशती का पाठ करना इतना सरल भी नहीं है। इसी कठिनाई को देखते हुए स्वयं देवाधिदेव महादेव ने एक बार मां पार्वती से कहा कि हे देवी सुनो। मैं तुम्हे एक गुप्त रहस्य बताता हूं। क्योंकि तुम्हारे इस सप्तशती का पाठ समस्त मानव के लिए सुगम व आसान नहीं है, इसलिए इसके लिए मैं एक रास्ता निकालता हूं। मेरी समझ से इसका एक उपाय 'कुण्जिकास्तोत्रÓ  का पाठ होगा। यह समस्त सप्तशती का सार होगा। जिसे बीज मंत्र भी कह सकते हैं। इस मंत्र के पाठक को  कील, कवच, अर्गलास्तोत्र, शापोद्दार, न्यास, रात्रिसुक्त, देवीसुक्त के पाठ करने की भी आवश्यकता नहीं होगी और नाहि पूरा सप्तशती पढऩा होगा। जो मनुष्य प्रात: काल उपर्युक्त स्त्रोत का पाठ करेगा उसके सारे विघ्न और बाधा नष्ट हो जाएंगे और उसे समस्त दुर्गासप्तशती के पाठ के बराबर का फल प्राप्त होगा। वहीं जो मनुष्य इस कुण्जिकास्तोत्र का पाठ तथा देवी सुक्त के सहित सप्तशती पाठ से परम सिद्धि कि प्राप्ति होगी।
1.मारण- काम व क्रोध का नाश
2.मोहन- इष्टदेव की कृपा
3.वशीकरण- मन का वशीकरण
4.स्तम्भन- इंद्रियों की विषयों के प्रति उपरति और उच्चाटन, मोक्ष प्राप्ति के लिए छटपटाहट, ये सभी इस स्तोत्र के इस उद्देश्य से सेवन करने से सफल होते हैं।

सिद्ध कुण्जिका स्तोत्रम्
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'ऊं ऐं ह्रींं क्लीं चामुण्डाये विच्चै। ऊं ग्लौं हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट स्वाहा।Ó
नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि। नम : कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषामर्दिनि।।
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि।
 जाग्रतं हि महादेवी जपं सिद्धंं कुरूष्व में।
 ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींंकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरुपे नमोस्तु ते।
 चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।
 विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणि।
धां धींं धूं धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
 क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवी शां शीं शूं में शुभं करू।
हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नम:।
 अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।
पां पीं पूं पार्वती पूर्णां खां खीं खूं खेचरी तथा।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्र सिद्धि कुरूष्व मे।Ó
अंत में देवाधिदेव ने कहा कि हे देवी  जो मनुष्य श्री मार्कण्डेय पुराण की कथा या पाठ सुनता है उसके करोड़ों कल्पों के किए हुए पाप समूह नष्ट हो जाते हैं तथा परम योग की प्राप्ति होती है। उसे न यमराज का भय होता है और न नरकों से। इस पृथ्वी पर उसकी वंश परंपरा सदा कायम रहती है।

Wednesday, March 2, 2016

तंत्र-मंत्र-यंत्र भाग-3

मनुष्य सदा विभिन्न परिस्थितियों में किसी भी कार्य को सिद्ध होते ही देखना चाहता है। यह उसकी मूल प्रकृति का हिस्सा है, क्योंकि निस्काम  कर्म करने वाले मनुष्य हैं ही कहां? जबकि श्रीमद् भागवत गीता में श्री कृष्ण ने कहा है निस्काम कर्म करो और
फल मुझ पर छोड़ दो। लेकिन आज के भौतिकवादी युग में ऐसा संभव है क्या? लेकिन मनुष्य करे भी तो क्या? भागम भाग के इस दौर में वह कभी भी अपने आपको सुरक्षित नहीं पाता है। ऐसे में मनुष्य कुछ ऐसे उपाय चाहता है जो उसे चहुंओर से सुरक्षित कर सके। तो प्रश्न उठता है कि ऐसा कोई उपाय है क्या? तो इसका जवाब है हां। वह क्या है इस बारे में मैं आपको तंत्र-मंत्र की तीसरी कड़ी में बताने जा रहा हूं :-

ऋग्वेद में मां भग्वती कहती है - 'अहं रूद्रेभिर्वसुभिश्चराम्य हमादित्यैरुत विश्वदेवै:।
अहं मित्रावरुणोभा बिभम्र्य हमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा।।Ó
                                                                                                            ऋग्वेद:-8/7/11
अर्थात मैं रुद्र, वसु, आदित्य और विश्वेदेवो के रूप में विचरती हूं। वैसे ही मित्र, वरुण, इंद्र, अग्नि और अश्विनी कुमारों के रूप धारण करती  हूं।
जबकि ब्रह्मसूत्र में कहा गया है 'सर्वोपेता तद्दर्शनातÓ अर्थात वह परा शक्ति सर्वसामथ्र्य से युक्त है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष देखा जाता है। इस दृष्टि से मनुष्य मार्कण्डेय पुराण में वर्णित मेरे 32 नामों - ' दुर्गा, दुर्गार्तिशमनी, दुर्गापद्विनिवारिणी, दुर्गमच्छेदिनी, दुर्गसाधिनी, दुर्गनाशिनी, दुर्गत्तोद्धारिणी, दुर्गनिहन्त्री, दुर्गमापहा, दुर्गमज्ञानदा, दुर्गदैत्यलोकदवानला, दुर्गमा, दुर्गमालोका, दुर्गमात्मस्वरूपिणी, दुर्गमार्गप्रदा, दुर्गमविद्या, दुर्गमाश्रिता, दुर्गमज्ञानसंस्थाना, दुर्गमध्यानमासिनी, दुर्गमोहा, दुर्गमगा, दुर्गमार्थस्वरूपिणी, दुर्गमासुरसंहन्त्री, दुर्गमायुधधारिणी, दुर्गमाड्गी, दुर्गमता, दुर्गम्या, दुर्गमेश्वरी, दुर्गभीमा, दुर्गभामा, दुर्गभा, दुर्गदारिणी Ó  का पाठ करता है वह नि:संदेह सब प्रकार के भय से मुक्त हो जाएगा। कोई भी मनुष्य यदि शत्रुओं से पीडि़त हो, दुर्भेद्य बंधन में पड़ा हो वह इस 32 नामों का पाठ   कर उससे मुक्त हो सकता है। जो भारी विपत्ति में पडऩे पर भी इस 'दुर्गाद्वात्रिशन्नाममालाÓ का एक लाख बार पाठ कर लेता है, स्वयं करता है या ब्राह्मणों से करवाता है वह सब प्रकार की विपत्तियों से मुक्त हो जाता है। वहीं अग्नि में मधुमिश्रित सफेद तिल से इन नामों का लाख बार हवन कर लेने से मनुष्य समस्त विपत्तियों, आपत्तियोंं से मुक्त हो सकता है। इस नाम माला का पुरश्चरण 30 हजार का है। पुरश्चरण पूर्वक पाठ करने से मनुष्य इसके द्वारा संपूर्ण कार्य सिद्ध कर सकता है। इतना ही नहीं अगर राजा भी उसका वध करने का आदेश दे दे अथवा किसी कठोर दंड का आज्ञा दे, या युद्ध में शत्रुओं से घिर जाए अथवा वन में हिंसक आदि पशुओं से घिर जाए तो ऐसे में मनुष्य अगर 108 बार मां दुर्गा के इस 32 नाम का पाठ कर ले तो वह उस भय से मुक्त हो जाता है। स्वयं दुर्गासप्तशती में कहा गया है कि विपत्ति के समय इसके समान भयनाशक दूसरा कोई उपाय नहीं है। लेकिन इसकी फल प्राप्ति के लिए आवश्यक है पूर्णत: देवी के प्रति शरणागति।

Thursday, February 25, 2016

तंत्र- मंत्र- यंत्र: भाग 2


तंत्र साधना में मंत्र और यंत्र दोनों की आवश्यकता होती है। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। मंत्र का कार्य ध्वनि के क्षेत्र में प्रभाव डालना है और यंत्र का कार्य दृश्य के क्षेत्र में प्रभाव डालना है।
मंत्र योग को एक विज्ञान भी कहा गया है। 'मननात्त्रायते इति मंत्र:Ó। अर्थात जिसके बार-बार स्मरण मात्र से मनुष्य जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है और उसके जीवन में अलौकिक शक्तियों का उदय होता है।
वहीं सौन्दर्य लहरी के प्रथम श्लोक में शंकराचार्य ने कहा है- 'शिव: शक्त्या युक्तोयदि शक्ति प्रभवितुं खलमÓ। अर्थात् शक्ति की प्रकृति त्रिगुणात्मक होती है। इसी कारण से तंत्र में शक्ति को अधोमुखि त्रिभुज के रुप में अभिव्यक्त किया जाता है। इन तीनों तत्वों को सत्व, रज, तम और सगुणात्मक उपासना में महासरस्वती, महालक्ष्मी व महाकाली की संज्ञा दी गई है। इसके अलावा ब्रह्मांड में छह प्रकार की शक्तियां विद्यमान हैं-पराशक्ति, ज्ञान शक्ति, इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति, कुण्डलिनी शक्ति और मंत्र शंक्ति।

सनातन धर्म में तंत्र का महत्व:-
मार्कण्डेय पुराण और अथर्ववेद तंत्र शास्त्र का सर्वोत्तम ग्रंथ है। मार्कण्डेय पुराण में 700 श्लोकों का उल्लेख है। इसमें मां दुर्गा की गोपनीय तांत्रिक साधना का वर्णन है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण मंत्र हैं-'ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चैÓ। वहीं अथर्ववेद में  ऋचाओं(श्लोक)की संख्या 731 है। इसमें विपत्ति और व्याधि नाश एवं भूत- प्रेत से मुक्ति संबंधित मंत्र हैं।
शक्ति की अभिव्यक्ति के लिए हमेशा आधार की आवश्यकता होती है, और बिना आधार शक्ति प्रकट नहीं होती।
मंत्र में अद्भुत और असीमित शक्तियां निहित हैं। कोई भी मंत्र अपने आप में पूर्ण है। साधक विभिन्न मंत्रों का प्रयोग विभिन्न शक्तियों को प्राप्त करने के लिए करते हैं।  इसके लिए गहन साधना और सिद्ध गुरु की भी आवश्यकता होती है। यदि गुरु न मिले तो शुद्ध हो कर शुभ मुहूर्त में मंत्र पाठ करें। यंत्र पूजन करें। फिर साधना प्रारम्भ करें।

मंत्र साधना में पांच शुद्धियां अनिवार्य है। 
भाव शुद्धि, मंत्र शुद्धि, द्रव्य शुद्धि, देह शुद्धि और स्थान शुद्धि। अपनी बायीं ओर दीपक तथा दायीं तरफ धूप रखें। शुभ मुहूर्त में निश्चित संख्या में संकल्प करके जाप प्रारम्भ करें।
सभी इष्ट की साधना के लिए अलग-अलग प्रकार की मालाओं का विधान है। मालाओं में 108 गुडिया भगवान शिव के 'शिवसूत्रÓ में वर्णित 108 ध्यान पद्धतियों का सूचक है।
शिव के लिए रुद्राक्ष की माला, हनुमान के लिए रक्त चन्दन या मंूगा की माला, विष्णु के लिए तुलसी या चन्दन, लक्ष्मी के लिए कमलगट्टा एवं अधिकांश कार्यों के लिए स्फटिक की माला उपयोगी होती है।
अलग-अलग कार्यो के लिए गुडियों की संख्या का विशेष महत्व होता है। जैसे -मोक्ष प्राप्ति के लिए 25 गुडियों की माला, धन और लक्ष्मी के लिए 30 गुडियों की माला, निजी स्वार्थ के लिए 27 गुडियों की माला, प्रिया प्राप्ति के लिए 54 गुडियों की माला, और समस्त कार्यों एवं सिद्धियों के लिए 108 गुडियों की माला का विधान है।

Saturday, December 19, 2015

महामृत्युंजय शिव मंत्र ही सभी कष्टों से मुक्ति के उपाय

एको देवो महेश्‍वर। अर्थात भगवान भोलेनाथ ही सभी भूतों के प्रमुख पूजनीय व आराध्‍य देव हैं जिनकी कृपा से हर योनी का जीव अपनी कामना सिद़ध कर सकता है। सनातन धर्म की मान्यताओं में संसार पंचभूतों यानी पृथ्वी, जल, आकाश, वायु और अग्रि से बना है। ये पंच तत्व भी कहलाते हैं। हर तत्व का एक देवता है जो पंच देवों के रूप में पूजनीय हैं। भगवान शिव इन पांच तत्वों में से पृथ्वी तत्व के देवता माने जाते हैं। यही कारण है कि भैतिकवादी संसार में सुखों और कामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान शिव की उपासना का महत्व है। लिंग पुराण के अनुसार शिव ज्योर्तिलिंग अर्द्धरात्रि के समय प्रकट हुआ था। इसलिए रात के समय शिव साधना बहुत ही असरदार मानी जाती है।
शिव पुराण के अनुसार महामृत्युंजय मन्त्र से कल्याणकारी शिव प्रसन्न होते हैं और धन ,सम्मान एवं ख्याति का विस्तार होता है। मृत्युतुल्य कष्ट, लंबी बीमारी एवं घरेलू समस्या से ग्रस्त होने पर महामृत्युंजय मन्त्र रामबाण सिद्ध होता है। जन्म कुंडली मे अगर मारकेश ग्रह बैठा हो या हाथ की आयु रेखा जगह जगह से कट रही हो या मिटी हुई हो तो यह जप अवश्य करें। जप की मात्रा सवा लाख होनी चाहिए।

मारकेश ग्रह के लक्षण: कुंडली मे मारकेश ग्रह बैठा होने का मुख्य पहचान है आपके मन मे बैचनी का अनुभव होना। किसी कार्य मे मन नहीं लगाना ,दुर्घटना होते रहना, बीमारी से त्रस्त रहना, अपनों से मनमुटाव होना, शत्रुओं की संख्या मे निरंतर वृद्धि होना एवं कार्य पूरा होते होते रह जाना, समाज मे मान और सम्मान की कमी होना। जब मारकेश ग्रह की महादशा व्यतीत होने लगती है तो यह मृत्यु का कारण बन जाता है। जप शुरू करने से पूर्व अगर रुद्राभिषेक कर लिया जाए तो मन्त्र विशेष फलदायी हो जाता है।

जप नियम: जप निर्धारित मात्रा मे तथा निर्धारित समय पर प्रतिदिन के हिसाब से होना चाहिए। जप के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन, सात्विक भोजन, सत्य बचन, अहिंसा का पालन व वाणी पर नियंत्रण होना जरूरी है। अन्यथा यह जप पूर्ण फलदायी नहीं होता है। जप मे नियमबद्धता का होना ज्यादा जरूरी है। जप अपने घर या शिवालय में करें। अगर शिवालय किसी नदी के किनारे हो तो यह जप विशेष फलदायी होता है।

जप के समय ध्यान मे रखने वाली बातें :जप उसी समय प्रारम्भ करना चाहिए जब शिव का निवास कैलाश पर्वत पर, गौरी के सान्निध्य हों या शिव बसहा पर आरूढ़ हों। शिव का वास जब शमशान में हो तो जप की शुरुआत नहीं करनी चाहिए। जप करते समय मुंह से आवाज नहीं निकालना चाहिए । जप के दौरान जम्हाई आने से वायें हाथ की उंगली से चुटकी बजाना चाहिए। जप के समय शिव का स्मरण सदैव करते रहना चाहिए। जप के पूर्ण होने पर हवन करना चाहिए और हवण के अंत में जप की कुल संख्या का दशांश तर्पण और उसका दशांश मार्जन करना चाहिए।  तदुपरांत दान एवं ब्राह्मण भोजन करवाना चाहिए।
कहा गया है दुख मे सुमिरन सब करे दुख मे करे न कोई, जो सुख मे सुमिरन करे दुख कहे को होय। इसलिये अगर आप कोई समस्या से ग्रस्त नहीं हैं आप साधारण तौर से अपनी जि़ंदगी व्यतीत कर रहे हैं तब भी आप शिव के इस चमत्कारी मन्त्र का जप अवश्य करें। जिंदगी रूपी नदी सुख और दुख रूपी दो किनारों के बीच प्रवाहित होती है, अगर आप समय रहते शिव मन्त्र का जप करते रहेंगे तो आप सदैव प्रसन्न रहेंगे।

शिव की प्रसन्नता प्राप्ति हेतु कुछ अन्य सुगम मन्त्र:
1.ह्रों जूं स:। इस शिव मन्त्र के नियमित 108 बार जप करने से शिव की कृपा वर्षा निरंतर होते रहती है।
2.नम: शिवाय। इस शिव मन्त्र का 108 बार प्रतिदिन जप आपको निरंतर प्रगति की ओर ले जाएगा। 

Wednesday, December 2, 2015

मां बगलामुखी की साधना और उपाय

कोई भी साधना तब तक सफल नहीं होती जब तक देवी की कृपा न हो। इसके लिए निर्विकार भाव और अंतरिक तथा वाह्य शुद्धिकरण के पश्चात कुशल गुरु के मार्ग निर्देशन के बाद ही शुरु करनी चाहिए। ं
भगवती बगला सुधा-समुद्र के मध्य में स्थित मणिमय  मण्डप में रत्नवेदी पर रत्नमय सिंहासन पर विराजती हैं।  पीतवर्णा होने के कारण ये पीत रंग के ही वस्त्र, आभूषण व माला धारण किये हुए हैं। इनके एक हाथ में शत्रु की  जिह्वा और दूसरे हाथ में मुद्गर  है। व्यष्टि रूप में शत्रुओं का नाश करने वाली और समष्टि रूप में परम ईश्वर की सहांर-इच्छा की अधिस्ठात्री शक्ति बगला है।
श्री प्रजापति ने बगला उपासना वैदिक रीति से की और वे सृस्टि की संरचना करने में सफल हुए। उन्होंने इस विद्या का उपदेश सनकादिक मुनियों को दिया।  सनतकुमार ने इसका उपदेश श्री नारद को और श्री नारद ने सांख्यायन परमहंस को दिया। जिन्होंने छत्तीस पटलों में बगला तंत्र ग्रन्थ की रचना की। स्वतंत्र तंत्र के अनुसार भगवान् विष्णु इस विद्या के उपासक हुए। फिर श्री परशुराम जी और आचार्य द्रोण इस विद्या के उपासक हुए। आचार्य द्रोण ने यह विद्या परशुराम जी से ग्रहण की।

श्री बगला महाविद्या ऊर्ध्वाम्नाय के अनुसार ही उपास्य हैं जिसमें स्त्री (शक्ति) भोग्या नहीं बल्कि पूज्या है। बगला महाविद्या श्री कुल से सम्बंधित हैं। श्रीकुल की सभी महाविद्याओं की उपासना अत्यंत सावधानी पूर्वक गुरु के मार्गदर्शन में करनी चाहिए।  श्री बगलामुखी को ब्रह्मास्त्र विद्या के नाम से भी जाना जाता है।  शत्रुओं का दमन और विघ्नों का शमन करने में विश्व में इनके समकक्ष कोई अन्य देवता नहीं है।
भगवती बगलामुखी को स्तम्भन की देवी कहा गया है।  स्तम्भनकारिणी शक्ति नाम रूप से व्यक्त एवं अव्यक्त सभी पदार्थो की स्थिति का आधार पृथ्वी के रूप में शक्ति ही है और बगलामुखी उसी स्तम्भन शक्ति की अधिस्ठात्री देवी हैं।  इसी स्तम्भन शक्ति से ही सूर्यमण्डल स्थित है। सभी लोक इसी शक्ति के प्रभाव से ही स्तंभित है।
 जो साधक इस साधना को पूर्ण कर, सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें इन तथ्यो की जानकारी होना अति आवश्यक है।

1 ) कुल -महाविद्या बगलामुखी श्री कुल से सम्बंधित है।

2 ) नाम -बगलामुखी, पीताम्बरा , बगला , ब्रह्मास्त्र विद्या।

3 ) कुल्लुकामंत्र -जाप से पूर्व उस मंत्र कि कुल्लुका का न्यास सिर में किया जाता है। इस विद्या की कुल्लुका हूं छ्रौ है।

4)  महासेतु - साधन काल में जप से पूर्व 'महासेतुÓ का जप किया जाता है।  ऐसा करने से लाभ यह होता है कि साधक प्रत्येक समय, प्रत्येक स्थिति में जप कर सकता है।  इस महाविद्या का महासेतु स्त्रीं है।  इसका जाप दस बार किया जाता है।

5)  कवचसेतु - इसे मंत्रसेतु भी कहा जाता है।  जप प्रारम्भ करने से पूर्व इसका जप एक हजार बार किया जाता है।  ब्राह्मण व छत्रियों के लिए प्रणव , वैश्यों  के लिए फट तथा शूद्रों के लिए ह्रीं कवचसेतु  है।

6 ) निर्वाण-ह्रूं ह्रीं श्रीं  से सम्पुटित मूल मंत्र का जाप ही इसकी निर्वाण विद्या है। इसकी दूसरी विधि यह है कि पहले प्रणव कर, अ , आ , आदि स्वर तथा क, ख , आदि व्यंजन पढ़कर मूल मंत्र पढ़ें और अंत में ऐं लगाएं और फिर विलोम गति से पुनरावृत्ति करें।

7 ) बंधन -किसी विपरीत या आसुरी बाधा को रोकने के लिए इस मंत्र का एक हजार बार जाप किया जाता है। मंत्र इस प्रकार है -ऐं ह्रीं ह्रीं ऐं

8) मुद्रा-इस विद्या में योनि मुद्रा का प्रयोग किया जाता है।

9) प्राणायाम-साधना से पूर्व दो मूल मंत्रो से रेचक, चार मूल मंत्रो से पूरक तथा दो मूल मंत्रो से कुम्भक करना चाहिए। दो मूल मंत्रो से रेचक, आठ मूल मंत्रो से पूरक तथा चार मूल मंत्रो से कुम्भक करना और भी अधिक लाभ कारी है।

10 ) दीपन-दीपक जलने से जैसे रोशनी हो जाती है, उसी प्रकार दीपन से मंत्र प्रकाशवान हो जाता है। दीपन करने हेतु मूल मंत्र को योनि बीज ईं  से संपुटित कर सात बार जप करें।

11) प्राण योग-बिना प्राण अथवा जीवन के मन्त्र निष्क्रिय होता है। अत: मूल मन्त्र के आदि और अन्त में माया बीज ह्रीं से संपुट लगाकर सात बार जप करें ।

12 ) मुख शोधन-हमारी जिह्वा अशुद्ध रहती है जिस कारण उससे जप करने पर लाभ के स्थान पर हानि ही होती है। अत: ऐं ह्रीं  ऐं  मंत्र से दस बार जाप कर मुखशोधन करें।

13 ) मध्य दृस्टि -साधना के लिए मध्य दृस्टि आवश्यक है। अत: मूल मंत्र के प्रत्येक अक्षर के आगे पीछे यं बीज का अवगुण्ठन कर मूल मंत्र का पांच बार जप करना चाहिए।

14 ) शापोद्धार-मूल मंत्र के जपने से पूर्व दस बार इस मंत्र का जप करें हलीं बगले ! रूद्र शापं विमोचय विमोचय ? ह्लीं स्वाहा।

15 ) उत्कीलन-मूल मंत्र के आरम्भ में ह्रीं स्वाहा मंत्र का दस बार जप करें।

16 ) आचार- इस विद्या के दोनों आचार हैं, वाम भी और दक्षिण भी ।
 एक बार जो मां बगला का कृपापात्र बन जाता है वह चहुं ओर से संपन्‍न व सुरक्षित भी हो जाता है।